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सालिक गणवीर's Blog – May 2020 Archive (6)

ग़ज़ल ( ये नया द्रोहकाल है बाबा...)

(2122 1212 22/112)

शह्र में फ़िर बवाल है बाबा

ये नया द्रोहकाल है बाबा

एक तालाब अब नहीं दिखता

क्या यही नैनीताल है बाबा?

क्या इसे ही उरूज कहते हैं?

अस्ल में ये ज़वाल है बाबा

भूख हर रोज़ पूछ लेती है

रोटियों का सवाल है बाबा

आंख इतना बरस चुकी अब तो

आंसुओं का अकाल है बाबा

मैं अकेला ही लड़ पड़ा सबसे

देखकर वो निढाल है बाबा

क़ब्र के वास्ते जगह न रही

फावड़ा है…

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Added by सालिक गणवीर on May 31, 2020 at 8:00am — 18 Comments

ग़ज़ल ( नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं....)

(1222 1222 122)

नहीं था इतना भी सस्ता कभी मैं

बशर हूँ ,था बहुत मंहगा कभी मैं

अभी जिसने रखा है घर से बाहर

उसी के दिल में रहता था कभी मैं

जिसे कहते हो तुम भी झोपड़ी अब

मिरा घर है वहीं पर था कभी मैं

वहाँ पर क़ैद कर रक्खा है उसने

जहाँ देता रहा पहरा कभी मैं

सड़क पर क़ाफिला है साथ मेरे

नहीं इतना रहा तन्हा कभी मैं

मुझे भी तुम अगर तिनका बनाते

हवा के साथ उड़ जाता कभी…

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Added by सालिक गणवीर on May 24, 2020 at 8:30am — 8 Comments

ग़ज़ल ( अंधी गली के मोड़ पर.....)

 (221 2121  1221 212)

अंधी गली के मोड़ पे सूना मकान है

तन्हा-सा आदमी अब इस घर की शान है

हमसे उन्होंने आज तलक कुछ नहीं कहा

हर बार उससे पूछा है जो बेज़बान है

हालात-ए- माज़ूर यक़ीनन हुये बुरे

ऊपर चढ़ाई है वहीं नीचे ढलान है

बदक़िस्मती का ये भी नमूना तो देखिये

गड्ढे नहीं मिले थे जहाँ पर खदान है

मरने के बाद भी तो फ़राग़त नहीं मिली

सारे बदन पे बोझ है मिट्टी लदान है

*मौलिक एवं…

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Added by सालिक गणवीर on May 21, 2020 at 6:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल ( हम सुनाते दास्ताँ फिर ज़िन्दगी की....)

( 2122 2122 2122 )

हम सुनाते दास्ताँ फिर ज़िन्दगी की

काश हम भी काटते फसलें ख़ुशी की

अब चुरा लो शम्स की भी धूप सारी

कोई तो बदलो  ये सूरत तीरगी की

जानवर अब हैं ज़ियादा जंगलों में

नस्ल घटती जा रही है आदमी की

हैं अंधेरे घर में अपने क़ैद सारे

कौन खींचेगा लकीरें रौशनी की

जो भी हो सागर मिलेगा तिश्नगी को

बाढ़ ले जाये हमें अब तो नदी की

आंखेंं फट जाएँगी हैरत से…

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Added by सालिक गणवीर on May 15, 2020 at 7:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल ( तिजारत कैसे की जाए.....)

1222 1222 1222 1222

तिजारत कैसे की जाए हुआ है फैसला जब से

बड़ी किल्लत है पानी की लहू सस्ता हुआ जब से

मशीनें अब यहाँ पर और महंगी क्यों नहीं होंगी?

वतन में मुफ़्त ही इंसान भी मिलने लगा जब से

हमारा शह्र छोटा था मगर मिलता नहीं था वो

हमें अक्सर बुलाता है नयी दिल्ली गयाा जब से

समय के साथ कम होगी यही हम सोच बैठे थे

ये दूरी कम नहीं होती मिटा है फासला जब से

नयी शक्लें दिखाता था कभी जब सामने आया

नहीं जाता…

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Added by सालिक गणवीर on May 9, 2020 at 5:00pm — 17 Comments

ग़ज़ल ( नया ज़माना कभी न आया..)

(121 22 121 22 121 22  121 22)

नया ज़माना कभी न आया , पुरानी दुनिया बदल रही है

ज़मीन पैरों तले थी कल तक ,न जाने कैसे फिसल रही है

बुझा न पायेंगी आंधियाँ भी ,हवाओं से जिस की दोस्ती है

अभी तो शम्अ जवां हुई है ,अभी धड़ल्ले से जल रही है

किसी के अरमां मचल रहे हैं , हुई किसी की मुराद पूरी

यहाँ उठी है किसी की डोली, वहाँ से अरथी निकल रही है

निकल रहा है किसी का सूरज,अभी हुई दोपहर किसी की

हमारे दिन तो गुज़र चुके हैं , हमारी अब…

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Added by सालिक गणवीर on May 5, 2020 at 7:00am — 5 Comments

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