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Rajni chhabra's Blog – June 2010 Archive (7)

घर

घर
प्यार औ अपनत्व
जब दीवारों की
छत बन जाता है
वो मकान
घर कहलाता है
रजनी छाबरा

Added by rajni chhabra on June 21, 2010 at 10:55am — 3 Comments

AAS KA PANCHHI

आस का पंछी
मन इक् आस का पंछी
मत क़ैद करो इसे
क़ैद होंने के लिए
क्यां इंसान के
तन कम हैं

Added by rajni chhabra on June 19, 2010 at 1:00am — 3 Comments

SAATH

उमर भर
का साथ
निभ जाता
कभी एक ही
पल मैं
बुलबुले मैं
उभरने वाले
अक्स की उमर
होती है
फक्त एक ही
पल की

Added by rajni chhabra on June 16, 2010 at 12:40am — 7 Comments

माँ के आँचल सी

सर्दी मैं गर्मी और
गरमी मैं शीतलता
का एहसास
प्यार के ताने बने से बुनी
ममतामयी माँ
के आँचल सी
खादी केवल नाम नही हैं
खादी केवल काम नहीं हैं
खादी परिचायक है
सवाव्लंबन का
स्वाभिमान का
देश के प्रति
आपके अभिमान का
रंग उमंग और
प्यार के धागे से बुनी
देश ही नहीं
विदेश मैं भी पाए विस्तार
खादी को बनाइये
अपना जूनून
खादी दे
तन मन को सुकून

Added by rajni chhabra on June 14, 2010 at 4:35pm — 7 Comments

Takdeer

तकदीर
गर रोने सी ही
बदल सकती तकदीर
यह ज़मीन बस सैलाब होती
गर अश्क बहाने सी होती
हर गम की तदबीर
यह नम आंखें
कभी बेआब न होती

Added by rajni chhabra on June 4, 2010 at 8:50am — 9 Comments

kaash!

काश!


काश!अपना कह देने भर से ही

गैर अपने होते

तो अनजान शहर में भी

अजनबी लोगों से घिरे

खुशनमा सपने होते

मगर हकीकत तो यह की

अपने ही शहर में अपने

बेगानों सा मिला करते हैं

क्यों खफा रहते हैं आप हम से

इस पर यह गिला करते हैं



रजनी छाबरा

Added by rajni chhabra on June 2, 2010 at 9:00am — 7 Comments

बाल श्रमिक

बाल श्रमिक

वह जा रहा है बाल श्रमिक

अधनंगे बदन पर लू के थपेड़े सहते

तपती,सुलगती दुपहरी मैं,सर पर उठाये

ईंटों से भरी तगारी

सिर्फ तगारी का बोझ नहीं

मृत आकांक्षाओं की अर्थी

सर पर उठाये

नन्हे श्रमिक के बोझिल कदम डगमगाए

तन मन की व्यथा किसे सुनाये

याद आ रहा है उसे

मां जब मजदूरी पर जाती और रखती

अपने सर पर ईंटों से भरी तगारी

साथ ही रख देती दो ईंटें उसके सर पर भी

जिन हालात मैं खुद जे रही थी

ढाल दिया उसी मैं बालक को भी

माँ के… Continue

Added by rajni chhabra on June 1, 2010 at 1:33am — 7 Comments

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