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विनोद खनगवाल's Blog – July 2015 Archive (2)

नशा (लघुकथा)

"सुमन, गुरु जी के आशीर्वाद से तुम्हारा घर तो स्वर्ग बन गया है। अब गालियों की नहीं बल्कि सतसंग के भजनों की आवाजें आती रहती हैं।"
"हाँ बहन! सही कह रही हो" - सुमन ने सहमति जताते हुए कहा।- 'अब हकीकत भी कैसे बताए कि पहले पति की कमाई ठेके पर जाती थी और अब आश्रम में.....।'

मौलिक और अप्रकाशित

Added by विनोद खनगवाल on July 20, 2015 at 4:07pm — 8 Comments

फैसला (लघुकथा)

"हैलो रवि, घरवालों ने मेरी शादी तय कर दी है। प्लीज मुझे यहाँ से निकल ले चलो। मैं मंगलसूत्र पहनूंगी तो तुम्हारे हाथों से वरना अपनी जान दे दूंगी।"

"सुजाता, पागल मत बनो। यही तो बढिया मौका है अपने पास....."

"क्या मतलब?"

"अरे, हम अपनी जिंदगी की शुरुआत करेंगे लेकिन तुम्हारी शादी के बाद। तुम दोनों तरफ का माल समेट लेना। शादी के अगले दिन जब तुम मिलनी पर आओगी। मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊँगा। फिर दोनों मिलकर ऐश करेंगे ऐश।"

प्यार में पागल हुई सुजाता ने पूरी प्लानिंग के साथ काम…

Continue

Added by विनोद खनगवाल on July 18, 2015 at 2:32pm — 4 Comments

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