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Aditya Kumar's Blog – August 2013 Archive (6)

हे कृष्ण बनू तेरा अनुगामी!

शिशु रूप में प्रकट हुए तुम,

अंधकारमयी कारा गृह में,

दिव्यज्योति से हुए प्रदीपित,

अतिशय मोहक अतिशय शोभित,

अर्धरात्रि को पूर्ण चन्द्र से

जग को शीतल करने वाले

संतापों को हरने वाले,

अवतरित हुए तुम, अंतर्यामी!

हे कृष्ण बनू तेरा अनुगामी!

किन्तु देवकी के ललाट पर,

कृष्ण! तुम्हे खोने का था डर,

तब तेरे ही दिव्य तेज से

चेतनाशून्य हुए सब प्रहरी,

चट चट टूट गयी सब बेडी

मानो बजती हो रण भेरी,

धर कर तुम्हे शीश पर…

Continue

Added by Aditya Kumar on August 28, 2013 at 9:00pm — 17 Comments

पीछे हट जाने का डर है।

घोर तिमिर है, 

कठिन डगर है, 

आगे का कुछ नहीं सूझता,

पीछे हट जाने का डर है।

मन में इच्छाएं बलशाली 

शोणित में भी वेग प्रबल है,

रोज लड़ रहा हूँ जीवनसे

टूट रहा अब क्यों संबल है

मैंने अपनी राह चुनी है 

दुर्गम, कठिन कंटकों वाली 

जो ऐसी मंजिल तक पहुंचे 

जो लगे मुझे कुछ गौरवशाली

धूल धूसरित रेगिस्तानी हवा के छोंकें 

देते धकेल , आगे बढ़ने से रोकें 

सूखा कंठ, प्राण हैं अटके 

कब पहुंचूंगा निकट भला पनघट के

आगे बढ़ना भी दुष्कर…

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Added by Aditya Kumar on August 21, 2013 at 4:27pm — 21 Comments

और नहीं कुछ शेष रहे।

मुझे जलाओ पीडानल में, उस सीमा तक,
जिस पर अहंकार मरता है,
अभिमान आहें भरता है,
बाकि न कुछ द्वेष रहे,
और नहीं कुछ शेष रहे।

हे देव ! काट दो बंधन सारे ,
एक नहीं सब होवें प्यारे ,
न इर्ष्या का अवशेष रहे,
और नहीं कुछ शेष रहे।

चिंता छोड़ करें सब चिंतन
सुखमय हो जाए हर जीवन
उन्नति देश करे
और नहीं कुछ शेष रहे।

"मौलिक व अप्रकाशित"

 शब्द्कार : आदित्य  कुमार 

Added by Aditya Kumar on August 18, 2013 at 5:00pm — 9 Comments

कभी कभी मुझको लगता है जिन्दा जन आधार नहीं है

बार बार हमसे क्यों आकर उलझ उलझ कर

उलझ चुके कितने ही मुद्दे सुलझ सुलझ कर

ऐसे मुद्दे सुलझाने में वक्त करें क्यों जाया

अब तक सुलझा कर, बतला दो क्या पाया

उनको अपना स्वागत सत्कार समझ ना आया

किश्तवाड़ में हमें ईद त्यौहार समझ न आया

इतना सब कुछ हो जाने पर भारत चाहेगा मेल ?

शायद भारत को डर हो, कहीं रुक न जाये खेल। 

रत्ती का व्यापार नहीं है, चिंदी भर आकार नहीं है

भारत के उपकारों का उनको कुछ आभार नहीं है 

कभी कभी मुझको लगता है, भारत…

Continue

Added by Aditya Kumar on August 14, 2013 at 9:46pm — 8 Comments

मै हूँ राष्ट्रपुरुष भारत, मै कवि के मुख से बोल रहा हूँ

पर्वत राज हिमालय जिसका मस्तक है

जिसके आगे बड़े बड़े नतमस्तक है

सिन्धु नदी की तट रेखा पर बसा हुआ

गंगा की पावन धारा से सिंचित है

जिसको तुम सोने की चिड़िया कहते थे

छोटे बड़े जहाँ आदर से रहते थे 

जहाँ सभी धर्मो को सम्मान मिला

जहाँ कभी न श्याम श्वेत का भेद  हुआ

जिसको राम लला की धरती कहते है

गंगा यमुना सरयू जिस पर बहते है

जिस धरती पर श्री कृष्णा ने जन्म लिया

जहाँ प्रभु ने गीता जैसा ज्ञान दिया

जहाँ निरंतर वैदिक…

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Added by Aditya Kumar on August 4, 2013 at 8:00pm — 22 Comments

दुनिया में तुम सुन्दरतम हो

मेरे मन का तुम आकर्षण हो

इस ह्रदय का तुम स्पंदन हो

तुम कुमकुम हो तुम चन्दन हो

तुम ताजमहल से सुन्दर हो

 

बस तुम ही मेरी प्रियतम हो

दुनिया में तुम सुन्दरतम हो

 

तुम ही हो मेरा प्रेम राग

तुम ही हो मेरी प्रेम आग

मै भ्रमर बना तुम हो पराग

तुम मन मंदिर का हो चिराग

 

बस तुम ही मेरी प्रियतम हो

दुनिया में तुम सुन्दरतम हो

 

तुम ध्येय मेरे जीवन का हो

तुम ध्यान मेरे प्रतिपल का…

Continue

Added by Aditya Kumar on August 1, 2013 at 6:43pm — 5 Comments

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