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Ravi Prakash's Blog – September 2013 Archive (3)

रहने दो - (रवि प्रकाश)

रहने दो

मुक्ता-माला

जटाजूट

चाहे दे दो।

बहने दो

यौवन-हाला

गरल-घूँट

चाहे दे दो॥

तुम रखना

मधुशालाएँ

कालकूट

मुझको देना।

तुम रचना

जयमालाएँ

भस्म-भूत

मुझको देना॥



पा लेना

आधार तुम्हीं

निराधार

चाहे दे दो।

गा लेना

गौरव-गाथा

व्यथा-भार

चाहे दे दो॥

चूर करो

मंज़िल मेरी

चकफेरी

फिर मुझको दो।

दूर करो

बंसी-वीणा

रणभेरी

फिर मुझको दो॥



थोड़े… Continue

Added by Ravi Prakash on September 30, 2013 at 1:12pm — 18 Comments

किसी दिन - (रवि प्रकाश)

किसी दिन अचानक

रौँदे गए सपने

बवाल तो करेंगे।

जिन्हें हाशिए पर

धकेला है ज़बरन

सवाल तो करेंगे।



धमनी में जम कर

हुआ है जो पत्थर

बहेगा धमाके से।

सड़ी अर्गला से

उकताई खिड़कियाँ

खुलेंगी धड़ाके से।



जिस्म की रेत से

हज़ार बाँह वाले

निकलेंगे आबशार।

भरेंगे किनारे

मन की मरुभूमि पे

झूलेंगे देवदार।



कसकेगी कविता

जब पीड़ा व पीड़ित

रहेंगे एकाकार।

रचेगा नवगीत

अनुष्टुप भी अभीत

छाती का… Continue

Added by Ravi Prakash on September 24, 2013 at 7:30am — 14 Comments

ग़ज़ल - (रवि प्रकाश)

बदलियों से चाँदनी का झिलमिलाना शेष है।

घन तिमिर में दीपकों का बुदबुदाना शेष है॥

सावनों की खो चुकी झड़ियाँ कहीं मिल जाएँगी,

देवदारों की कतारों का सजाना शेष है।

फिर घृणा उन्मादिनी सी दौड़ती है प्राण में,

प्रीत के आखर अढ़ाई कसमसाना शेष है।

हलचलों में खो चली है रात की नि:शब्दता,

भोर की पहली किरण का खिलखिलाना शेष है।

रूढ़ियों के बाँध सारे तोड़ कर कविता बहे,

पीर की प्राचीर में यूँ छटपटाना शेष है।

फिर परिन्दों ने बदल दी आज उड़ने की अदा,

हाय! लेकिन… Continue

Added by Ravi Prakash on September 12, 2013 at 8:30am — 21 Comments

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