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जयनित कुमार मेहता's Blog – September 2016 Archive (3)

ग़ज़ल को ढूँढने, चलिए चलें खेतों में गाँवों में (ग़ज़ल)

1222   1222   1222   1222

न जाने धूल कब से झोंकता था मेरी आँखों में!

जो इक दुश्मन छुपा बैठा था मेरे ख़ैरख़्वाहों में!

भटकते फिरते थे गुमनाम होकर जो उजालों में!

हुनर उन जुगनुओं का काम आया है अंधेरों में!

फ़क़त इक वह्म था,धोखा था बस मेरी निगाहों का,

अलग जो दिख रहा था एक चेहरा सारे चेहरों में!

हक़ीक़त के बगूलों से हुए हैं ग़मज़दा सारे,

हुआ माहौल दहशत का,तसव्वुर के घरौंदों में!

ख़ता इतनी सी थी हमने गुनाह-ए-इश्क़…

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Added by जयनित कुमार मेहता on September 26, 2016 at 5:19pm — 9 Comments

नींद रहने लगी हर घडी लापता (ग़ज़ल)

212 212 212 212



ज़िन्दगी से है यूँ ज़िन्दगी लापता

जैसे हो रात से चाँदनी लापता



चाँद है चाँदनी है सितारे भी हैं

रात से अब मगर रात ही लापता



इस तरफ उस तरफ हर तरफ भीड़ है

शह्र से है मगर आदमी लापता



मुझको मुझसे मिलकर गया था जो शख्स

बदनसीबी कि है अब वही लापता



चाँद-तारों से जा मिलते हैं हम तभी

खुद से हो जाते हैं जब कभी लापता



मेरी आँखों को इक ख़्वाब क्या मिल गया

नींद रहने लगी हर घड़ी लापता



(मौलिक व… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on September 17, 2016 at 8:57pm — 10 Comments

आदमी गुम हो गया है ख्वाहिशों के दरमियाँ (ग़ज़ल)

2122 2122 2122 212



रास्ते कुछ और भी थे रास्तों के दरमियाँ

मंज़िलें कुछ और भी थीं मंज़िलों के दरमियाँ



बेख़याली में हुई थी गुफ़्तगू नज़रों के बीच

हो गया इक़रार लेकिन धड़कनों के दरमियाँ



क्यों रहे इंसानियत से वास्ता इंसान का

जब है दीवार-ए-सियासत मज़हबों के दरमियाँ



रिश्ते-नातों को निभाने का कहाँ है वक़्त अब

आदमी गुम हो गया है ख्वाहिशों के दरमियाँ



ये हमारी दिल की दुनिया इस क़दर वीरान है

धूल उड़ती है यहाँ पर बारिशों के… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on September 10, 2016 at 8:15pm — 3 Comments

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