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Featured Blog Posts – November 2015 Archive (4)


मुख्य प्रबंधक
अतुकांत कविता : प्रतिनिधि (गणेश जी बागी)

मैं सड़क हूँ

मुझे तैयार किया गया है

रोड रोलरों से कुचल कर.



मुझे रोज रौंदते हैं 

लाखों वाहन

अक्सर....

विरोध प्रदर्शन का दंश

झेलती हूँ

अपने कलेजे पर

होता रहता हैं

पुतला दहन भी

मेरे ही सीने पर

विपरीत परिस्थितियों में

मैं ही बन जाती हूँ

आश्रय स्थल

कई कई बार तो

प्राकृतिक बुलावे का निपटान भी

हो जाता है

मेरी ही गोद में



फिर भी.....

मैं सहिष्णु…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 29, 2015 at 1:00pm — 32 Comments

ज़िंदगी का रंग फीका था मगर इतना न था

ज़िंदगी का रंग फीका था मगर इतना न था

इश्क़ में पहले भी उलझा था मगर इतना न था

 

क्या पता था लौटकर वापस नहीं आएगा वो

इससे पहले भी तो रूठा था मगर इतना न था

 

दिन में दिन को रात कहने का सलीका देखिये

आदमी पहले भी झूठा था मगर इतना न था

 

अब तो मुश्किल हो गया दीदार भी करना तिरा

पहले भी मिलने पे पहरा था मगर इतना न था

 

उसकी यादों के सहारे कट रही है ज़िंदगी

भीड़ में पहले भी तन्हा था मगर इतना न…

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Added by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on November 15, 2015 at 2:00pm — 19 Comments

कैसे अपने मधु पलों को .... (१००वी रचना )

कैसे अपने मधु पलों को शूल शैय्या पे छोड़   आऊँ

स्मृति घटों पर विरहपाश के कैसे बंधन तोड़ आऊं

विगत पलों के अवगुंठन में

इक दीप अधूरा जलता रहा

अधरों पर   लज्जा शेष रही

नैनों में स्वप्न मचलता रहा

एकांत पलों में तृप्ति भाव को किस आँगन मैं छोड़ आऊँ

प्रिय स्मृति घटों पर विरहपाश के कैसे बंधन तोड़ आऊँ

अधरों से मिलना अधरों का

तिमिर का मौन शृंगार हुआ

तृषित देह का देह मिलन से

अंगार पलों  का संचार हुआ

किस पल को मैं बना के जुगनू तिमिर…

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Added by Sushil Sarna on November 4, 2015 at 7:30pm — 27 Comments

आलोचना के स्वर // आबिद अली मंसूरी!

कौन सुनता है

कौन सुनना चाहता है
किसे पसन्द है आलोचना अपनी
एक कड़वा सच
छिपा होता है
आलोचना के शब्दों में
जिसे
नहीं चहते हम
स्वीकार करना,
जानते हैं
अपने अन्दर फ़ैले
खरपतवारों को सभी
पर नहीं चाहते
उखाड़ना
उनकी जड़ों को,
कभी-कभी
अकारण ही
करना पड़ता है
सामना
आलोचनाओं के बबंडर…
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Added by Abid ali mansoori on November 3, 2015 at 8:30pm — 18 Comments

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