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Ravi Prabhakar's Blog (31)

कर्मजली (लघुकथा) रवि प्रभाकर

“अबे ओए,  क्या तू ही दीनू है?” अपने दलबल के साथ अचानक आ धमके थानेदार ने अपनी रौबीली आवाज में पूछा

”जी सरकार मैं ही दीनू हूँ ......”

“क्या यही वो लड़की है जिसके साथ आज जबरदस्ती हुई है?” कोने में सिसकती लड़की की तरफ देखकर थानेदार की आंखों में गुलाबी से डोरे तैरने लगे।

“जी सरकार..........”

“जी सरकार के बच्चे... शिकायत क्यों नहीं की थाने में आकर....”

“जी, वो मुखिया जी ने समझौता..... ”

”देखिए…

Continue

Added by Ravi Prabhakar on June 11, 2014 at 3:00pm — 16 Comments

लघुकथाः कौआ (रवि प्रभाकर)

कौआ आज फिर प्यासा था। लेकिन अब उसे हर हर रोज़ कंकड़ पत्थर इकट्ठे करते हुए बहुत कष्ट होने लगा था. वह इस रोज़ रोज़ के संघर्ष से मुक्ति चाहता था। फिर एक दिन अचानक ही उसने भगवे वस्त्र धारण कर लिए, माथे पर लंबा सा तिलक लगाया एक बड़ी सी स्टेज सजा कर ‘कांव-कांव’ करने लगा। देखते ही देखते अनगिनत लोग उसके अनुयायी बन उसकी जय जयकार करने लगे । अब वह सयाना कौआ बड़े आराम से दिन भर ‘कांव-कांव’ करता, क्योंकि उसकी ‘भूख’ व ‘प्यास’ का जीवन भर के लिए जुगाड़ हो चुका था।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by Ravi Prabhakar on December 17, 2013 at 4:48pm — 12 Comments

गर्भाधान (लघुकथा) - रवि प्रभाकर

“पापा ! टीचर ने कहा है कि फीस जमा करवा दो, नहीं तो इस बार नाम अवश्य काट दिया जाएगा।"
“अजी सुनते हो ! बनिया आज फिर पैसे मांगने आया था।”
“अरे बेटा ! कई दिन हो गए दवाई खत्म हुए, अब तो दर्द बहुत बढ़ता जा रहा है, आज तो दवाई ला दो।”

ये सभी आवाज़ें उसके मस्तिष्क पर हथोड़े की भाँति चोट कर रही थीँ।
मगर उसके दिल में एक नई कविता का खाका जन्म ले रहा था।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by Ravi Prabhakar on December 9, 2013 at 7:00pm — 41 Comments

मैं एकलव्य नहीं (लघुकथा)

परीक्षाएं निकट थीं लेकिन टीचर पिछले कई दिनों से क्लास से गायब थे. पढ़ाई का बहुत हर्जा हो रहा था जिसे देखकर उसे बेहद गुस्सा आता. रह रह कर उसके सामने अपनी विधवा बीमार माँ का चेहरा घूम जाता, जो लोगों के घरों में झाड़ू पोछा कर उसे पढ़ा रही थी. आखिर उस से रहा न गया और वह शिकायत लेकर प्रधानाचार्य के पास जा पहुंचा।

 “उस कक्षा में और भी तो विद्यार्थी है, सिर्फ तुम्हें ही शिकायत क्यों है।”
“क्योंकि मैं एकलव्य नहीं हूँ सर।”

(मौलिक और अप्रकाशित)    

Added by Ravi Prabhakar on December 3, 2013 at 10:00am — 24 Comments

सम्मान (लघुकथा)

बड़े साहिब राज्य स्तरीय साहित्य सम्मान प्राप्त कर बेहद प्रसन्न थे. कार्यलय पहुँचते ही उन्होनें अपने स्टेनो को बुलाया और कई हफ़्तों से लंबित उसकी लोन की फाइल क्लीयर की तथा साथ ही उसकी पन्द्रह दिन की छुट्टी की अर्जी भी मंजूर कर दी। जाते समय उन्होनें स्टेनो को एक और बढि़या सी कहानी लिखने का आदेश दिया।

Added by Ravi Prabhakar on October 5, 2013 at 4:16pm — 12 Comments

बधाई (लघु कथा )

सेमीनार में “कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न” विषय पर अपना भाषण देकर जब प्रिंसीपल साहिब स्टेज से उतरे तो सभी ओर तालियों की गड़गड़ाहट व वाहवाही गूंज रही थी,  सभी लोग बारी-बारी प्रिंसीपल साहिब को बधाईयां दे रहे थे। इसी क्रम में जब एक जूनियर अध्यापिका ने प्रिंसीपल साहिब को बधाई दी तो उन्हे लगा जैसे किसी ने सरे-बाजार उन्हे नंगा कर दिया हो।

- मौलिक व अप्रकाशित

Added by Ravi Prabhakar on October 3, 2013 at 4:00pm — 34 Comments

लघु कथा माँ

माँ

    आज फिर घर पर बहुत झगड़ा हुआ। “अब मैं घर वापिस नहीं आउंगा, नदी में डूब कर मर जाउंगा।” गुस्से से अपनी माँ को बोलकर वो घर से निकल पड़ा।
    “माँ, मुझे माफ कर दे, उठ माँ! आंखे खोल। तू आंखे क्यों नहीं खोलती” दोपहर को जब वो गुस्सा शांत होने के बाद घर वापिस आया तो आंगन में पड़ी अपनी माँ से लिपट कर जोर जोर से बोल रहा था।

Added by Ravi Prabhakar on February 13, 2012 at 6:32pm — 2 Comments

लघु कथा- तरकीब

‘क्या ठाकुर साहिब, आपने महरी के लड़के को कालेज पूरा करते ही नौकरी लगवाकर शहर भेज दिया !’
‘तू नहीं समझेगा छगन, अगर वो गांव में रहता तो अपने साथियों को भी पढ़ाता और प्रेरित करता और वो हमारे घरों का काम न करते।’ ठाकुर साहिब के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी।

Added by Ravi Prabhakar on December 2, 2011 at 7:30pm — 3 Comments

लघुकथा : बहू-बेटी

लघुकथा : बहू-बेटी



“अम्मा ! तुम भी घर का कोई काम किया करो, नहीं तो इस तरह तुम्हारे हाथ-पैर जुड़ जाएंगें।” घुटनों के दर्द से करहाती अपनी माँ की दुर्दशा देखकर ससुराल से आई बेटी ने कहा।

“ हाँ बेटी ! तू ठीक ही कहती है, किया करूंगी कुछ काम....”

“ हाँ दीदी, मैने भी कई बार अम्मा जी से कहा है कि आप भी कुछ काम किया करें .......” पास बैठी बहू ने कहा

” काम किया करूँ, तो तुझे ब्याह कर लाने का मुझे क्या फायदा........... काम किया करो....” सास ने बहू की बात को बीच में ही काटते हुए तीखे…

Continue

Added by Ravi Prabhakar on August 21, 2011 at 1:00pm — 7 Comments

रोना अपना-अपना

घर के आंगन के बीचो-बीच लाश पड़ी थी। सभी रो रहे थे। उसका भाई सोच रहा था ”क्या इसके बीबी-बच्चों का भार अब मुझे उठाना पड़ेगा?“ उसके मां बाप सोच रहे थे ”अब हमारा क्या होगा? हमारी देखभाल अब कौन करेगा?“ उसकी जवान बीवी सोच रही थी ”अब पहाड़ जैसा जीवन पति के बगैर अकेले कैसे काटूँगी?“ ..... और सभी ऊँची-ऊँची रो रहे थे।

Added by Ravi Prabhakar on January 4, 2011 at 8:30pm — 5 Comments

लघुकथा ”घर“

31 दिसंबर की सर्द रात को अपने फटे कम्बल के सहारे सर्द हवाओं के साथ संघर्ष करते हुए फुटपाथ पर लेटे हुए एक वृद्ध भिखारी ने जब  कुछ नौजवानों को सड़क पर मस्ती करते हुए देखा तो उसने सोचा ”इनका तो घर है, फिर यह घर जाकर लिहाफ की गर्मी में आराम से क्यों नहीं सोते?“

Added by Ravi Prabhakar on January 2, 2011 at 4:35pm — 8 Comments

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