For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

Sushil Sarna's Blog (893)

दोहा सप्तक. . . . विविध

दोहा सप्तक. . . . विविध

कह दूँ मन की बात या, सुनूँ तुम्हारी बात ।

क्या जाने कल वक्त के, कैसे हों हालात ।।

गले लगाकर मौन को, क्यों बैठे चुपचाप ।

आखिर किसकी याद में, अश्क बहाऐं आप ।।

बहुत मचा है आपकी. खामोशी का शोर ।

भीगे किसकी याद से, दो आँखों के कोर ।।

मन मचला जिसके लिए, कब समझा वह पीर ।

बह निकला चुपचाप फिर, विरह व्यथा का नीर ।।

दो दिल अक्सर प्यार में, होते हैं मजबूर ।

कुछ पल चलते साथ फिर, हो जाते वह दूर ।।

कहते हैं मजबूरियाँ,…

Continue

Added by Sushil Sarna on May 1, 2025 at 12:52pm — 2 Comments

दोहा सप्तक. . . लक्ष्य

दोहा सप्तक. . . . . लक्ष्य

कैसे क्यों को  छोड़  कर, करते रहो  प्रयास ।

लक्ष्य  भेद  का मंत्र है, मन  में  दृढ़  विश्वास ।।

करते  हैं  जो जीत से, लक्ष्यों का शृंगार ।

उनको जीवन में कभी, हार नहीं स्वीकार ।।

आज किया कल फिर करें, लक्ष्य हेतु संघर्ष ।

प्रतिफल है प्रयासों का , लक्ष्य प्राप्ति पर हर्ष ।।

देता है संघर्ष ही, जीवन को उत्कर्ष ।

आज नहीं तो जीत का, कल छलकेगा  हर्ष ।।

सच्ची कोशिश हो अगर, मंज़िल आती पास ।

मिल जाता संघर्ष को,…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 30, 2025 at 7:30pm — 6 Comments

दोहा षष्ठक. . . . आतंक

 

नहीं दरिन्दे जानते , क्या होता सिन्दूर ।

जिसे मिटाया था किसी ,  आँखों का वह नूर ।।

 

पहलगाम से आ गई, पुलवामा की याद ।

जख्मों से फिर दर्द का, रिसने लगा मवाद ।।

 

कितना खूनी हो गया, आतंकी उन्माद ।

हर दिल में अब गूँजता,बदले का संवाद ।।

 

जीवन भर का दे गए, आतंकी वो घाव ।

अंतस में प्रतिशोध के, बुझते नहीं अलाव ।।

 

भारत ने सीखी नहीं, डर के आगे हार ।

दे डाली आतंक को ,खुलेआम ललकार ।।

 

कर देंगे…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 26, 2025 at 1:00pm — 4 Comments

दोहा सप्तक. . . उल्फत

दोहा सप्तक. . . .  उल्फत

याद अमानत बन गयी, लफ्ज हुए लाचार ।

पलकों की चिलमन हुई, अश्कों से गुलजार ।।

आँखों से होते नहीं, अक्स नूर के दूर ।

दर्द जुदाई का सहे, दिल कितना मजबूर ।।

उल्फत में रुसवाइयाँ, हासिल हुई जनाब ।

मिला दर्द का चश्म को, अश्कों भरा खिताब ।।

उलझ गए जो आँख ने, पूछे चन्द सवाल ।

खामोशी से ख्वाब का, देखा किए जमाल ।।

हर करवट महबूब की, यादों से लबरेज ।

रही सताती रात भर, गजरे वाली सेज ।।

हासिल दिल को इश्क में, ऐसी हुई किताब…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 18, 2025 at 5:29pm — 2 Comments

दोहा सप्तक. . . .तकदीर

दोहा सप्तक. . . . . तकदीर

 

होती है हर हाथ में, किस्मत भरी लकीर ।

उसकी रहमत के बिना, कब बदले तकदीर ।।

भाग्य भरोसे कब भला, करवट ले तकदीर ।

बिना करम के जिंदगी, जैसे लगे फकीर ।।

बिना कर्म इंसान की, बदली कब तकदीर ।

श्रम बदले संसार में, जीने की तस्वीर ।।

चाहो जो संसार में, मन वांछित परिणाम ।

नजर निशाने पर करे, संभव हर संधान ।।

भाग्य भरोसे कब हुआ, जीवन का उद्धार ।

चाबी श्रम की खोलती, किस्मत का हर द्वार ।।

बिछा हुआ हर हाथ में,…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 11, 2025 at 2:30pm — 2 Comments

दोहा सप्तक. . . . विरह शृंगार

दोहा सप्तक. . . . विरह शृंगार

दृगजल से लोचन भरे, व्यथित हृदय उद्गार ।

बाट जोहते दिन कटा, रैन लगे  अंगार ।।

तन में धड़कन प्रेम की, नैनन बरसे नीर ।

बैरी मन को दे गया, अनबोली वह पीर ।।

जग क्या जाने प्रेम के, कितने गहरे घाव ।

अंतस की हर पीर को, जीवित करते स्राव ।।

विरही मन में मीत की, हरदम आती याद ।

हर करवट पर मीत से, मन करता संवाद ।।

बैठ अनमनी द्वार पर, विरहन देखे राह ।

मन में उठती हूक सी , पिया मिलन की चाह ।

नैन पिया की याद…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 20, 2025 at 8:48pm — 4 Comments

दोहा पंचक. . . . होली

दोहा पंचक. . . . . होली

अलहड़ यौवन रंग में, ऐसा डूबा आज ।

मनचलों की टोलियाँ, खूब करें आवाज ।।

हमजोली के संग में,  खेले सजनी रंग ।

चुपके-चुपके चल रहा, यौवन का हुड़दंग ।।

पिचकारी की धार से, ऐसे बरसे रंग ।

जीजा की गुस्ताखियाँ, देख हुए सब दंग ।।

कंचन काया का किया, पति ने ऐसा हाल ।

अंग- अंग रंग में ढला, यौवन लगे कमाल ।।

पारदर्शिता देख कर, दिलवाले हैरान ।

पिचकारी के रंग से , डोल उठा  ईमान ।।



सुशील सरना / 13-3-25

मौलिक एवं…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 13, 2025 at 8:44pm — No Comments

दोहा सप्तक. . . .

दोहा सप्तक. . . . . रिश्ते

तार- तार रिश्ते हुए, मैला हुआ अबीर ।

प्रेम शब्द को ढूँढता, दर -दर एक फकीर ।1।

सपने टूटें आस के , खंडित हो विश्वास ।

मुरझाते रिश्ते वहाँ, जहाँ स्वार्थ का वास ।2।

देख रहा संसार में, अकस्मात अवसान ।

फिर भी बन्दा जोड़ता, विपुल व्यर्थ सामान ।3।

ऐसे टूटें आजकल, रिश्ते जैसे काँच ।

पहले जैसे प्रेम की, नहीं रही अब आँच ।4।

रिश्तों के माधुर्य में, झूठी हुई मिठास ।

मन से तो सब दूर हैं , तन से चाहे पास…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 3, 2025 at 4:32pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . . उमर

दोहा पंचक. . . . .  उमर

बहुत छुपाया हो गई, व्यक्त उमर की पीर ।

झुर्री में रुक- रुक चला, व्यथित नयन का नीर ।।

साथ उमर के काल का, साया चलता साथ ।

अकस्मात ही छोड़ती, साँस देह का हाथ ।।

बैठे-बैठे सोचती, उमर पुरातन काल ।

शैशव यौवन सब गया, बदली जीवन चाल ।।

दौड़ी जाती जिंदगी, ओझल है ठहराव ।

यादें बीती उम्र की, आँखों में दें  स्राव ।।

साथ उमर के हो गए, क्षीण सभी संबंध ।

विचलित करती है बहुत, बीते युग की गंध ।।

सुशील सरना /…

Continue

Added by Sushil Sarna on February 28, 2025 at 6:02pm — 4 Comments

कुंडलिया. . .

कुंडलिया. . . .

जीना  है  तो  सीख  ले ,विष  पीने  का  ढंग ।
बड़े  कसैले   प्रीति  के,अब  लगते   हैं   रंग ।।
अब  लगते  हैं  रंग , जगत् में  छलिया  सारे ।
पल - पल बदलें रूप, स्वयं का साँझ सकारे ।।
बड़ा कठिन  है  सोम, भरोसे  का  यों  पीना ।
विष को जीवन  मान , पड़ेगा  यों  ही  जीना ।।

सुशील सरना / 27-2-25

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on February 27, 2025 at 8:52pm — 6 Comments

दोहा पंचक. . . . .नवयुग

दोहा पंचक. . . . नवयुग

प्रीति दुर्ग में वासना, फैलाती दुर्गन्ध ।

चूनर उतरी लाज की, बंध हुए निर्बंध ।।

पानी सूखा आँख का, न्यून हुए परिधान ।

बेशर्मी हावी हुई, भूले देना मान ।।

सार्वजनिक अश्लीलता, फैली पैर पसार ।

पश्चिम की यह सभ्यता, लील रही संस्कार ।।

पश्चिम के परिधान का, फैला ऐसा रोग ।

नवयुग  ने बस प्यार को, समझा केवल भोग ।।

अवनत जीवन के हुए, पावन सब प्रतिमान ।

भोग पिपासा आज के, नवयुग की पहचान ।।

सुशील सरना /…

Continue

Added by Sushil Sarna on February 21, 2025 at 8:29pm — No Comments

दोहा सप्तक. . . . . . अभिसार

दोहा सप्तक. . . . . .  अभिसार

पलक झपकते हो गया, निष्ठुर मौन प्रभात ।

करनी थी उनसे अभी, पागल दिल की बात ।।

विभावरी ढलने लगी, बढ़े मिलन के ज्वार ।

मौन चाँद तकने लगा, लाज भरे अभिसार ।।

लगा लीलने मौन को, दो साँसों का शोर ।

रही तिमिर में रेंगती, हौले-हौले भोर ।।

अद्भुत होता प्यार का, अनबोला संवाद ।

अभिसारों में करवटें, लेता फिर  उन्माद ।।

प्रतिबंधों की तोड़ता, साँकल मौन प्रभात ।

रुखसारों पर लाज की, रह जाती सौगात ।।

कुसुमित मन…

Continue

Added by Sushil Sarna on February 17, 2025 at 3:58pm — No Comments

दोहा दशम. . . . उल्फत

दोहा दशम - ..... उल्फत

अश्कों से जब धो लिए, हमने दिल के दाग ।

तारीकी में जल  उठे, बुझते हुए चिराग ।।

ख्वाब अधूरे कह गए, उल्फत के सब राज ।

अनसुनी वो कर गए, इस दिल की आवाज ।।

आँसू, आहें, हिचकियाँ, उल्फत के  ईनाम ।

नींदों से ली दुश्मनी, और हुए बदनाम ।।

माना उनकी बात का, दिल को नहीं यकीन ।

आयें अगर न ख्वाब है, उल्फत की तौहीन ।।

यादों से हों यारियाँ , तनहाई से प्यार ।

उल्फत का अंजाम बस , इतना सा है यार ।।

मिला इश्क को हुस्न से,…

Continue

Added by Sushil Sarna on February 10, 2025 at 1:04pm — 3 Comments

दोहा पंचक. . . शृंगार

रैन स्वप्न की उर्वशी, मौन प्रणय की प्यास ।

नैन ढूँढते नैन में, तृषित हृदय मधुमास ।।

 

वातायन की ओट से, हुए नैन संवाद ।

अरुणिम नजरों में हुए, लक्षित फिर उन्माद ।

 

मृग शावक सी चाल है,  अरुणोदय से गाल ।

सर्वोत्तम यह सृष्टि की, रचना बड़ी कमाल ।।

 

गौर वर्ण झीने वसन, मादकता भरपूर ।

जैसे हो यह सृष्टि का, अलबेला दस्तूर ।।

 

जब-जब दमके दामिनी, उठे मिलन की प्यास।

अन्तस में व्याकुल रहा, बांहों का मधुमास…

Continue

Added by Sushil Sarna on February 4, 2025 at 9:30pm — No Comments

कुंडलिया. . .

कुंडलिया. . .

मन से मन का हो गया, मन ही मन अभिसार ।
मन में  मन  के प्रेम  का, सृजित  हुआ संसार ।
सृजित हुआ संसार , हाथ  की  चूड़ी  खनकी ।
मुखर हुआ शृंगार , बात फिर निकली मन की ।
बंध  हुए  निर्बंध ,भाव   सब   निकले  तन  से ।
मन  ने  दी  सौगात , प्रीति  को  सच्चे  मन से ।

सुशील सरना / 2-2-25

मौलिक एवं अप्रकाशित 

Added by Sushil Sarna on February 2, 2025 at 5:05pm — No Comments

दोहा पंचक. . . . संबंध

दोहा पंचक. . . . संबंध

अर्थ लोभ की रार में, मिटा खून का प्यार ।

रिश्ते सब  आहत  हुए, शेष  रही तकरार ।।

वाणी  कर्कश  हो  गई, मिटी नैन से लाज ।

संबंधों में स्वार्थ की, मुखर हुई आवाज ।।

प्यार मिटा पैदा हुई, रिश्तों में तकरार ।

फीके - फीके  हो गए, जीवन  के  त्योहार ।।

दिखने को ऐसा लगे, जैसे सब हों साथ ।

वक्त पड़े तो छोड़ता, खून, खून का हाथ ।।

आपस में ऐसे मिलें, जैसे हों मजबूर ।

निभा रहे संबंध सब , जैसे हो दस्तूर ।।…

Continue

Added by Sushil Sarna on February 1, 2025 at 2:24pm — No Comments

दोहा सप्तक. . . धर्म

दोहा सप्तक. . . धर्म

धर्म बताता जीव को, पाप- पुण्य का भेद ।

कैसे जीना चाहिए, हमें सिखाते वेद ।। 

 

दया धर्म का मूल है, यही सत्य अभिलेख  ।

करे अनुसरण जीव जो, बदले जीवन रेख ।।

 

सदकर्मों से है भरा, हर मजहब का ज्ञान।

चलता जो इस राह पर, वो पाता पहचान ।।

 

पंथ हमें संसार में, सिखलाते यह  मर्म ।

जीवन में इन्सानियत, सबसे  उत्तम कर्म ।।

 

चलते जो संसार में, सदा धर्म की राह ।

नहीं निकलती कष्ट में, उनके मुख…

Continue

Added by Sushil Sarna on January 18, 2025 at 1:00pm — 2 Comments

दोहा सप्तक. . . जीत - हार

दोहा सप्तक. . . जीत -हार

 

माना जीवन को नहीं, अच्छी लगती हार ।

संग जीत के हार से, जीवन का शृंगार ।। 

 

हार सदा ही जीत का, करती मार्ग प्रशस्त ।

डरा हार से जो हुआ, उसका सूरज अस्त ।।

 

जीत हार के राग  में, उलझा जीवन गीत ।

दूर -दूर तक जिंदगी, ढूँढे सच्चा मीत ।।

 

कभी हार है जिंदगी, कभी जिंदगी जीत ।

जीवन भर होता ध्वनित, इसमें गूँथा गीत ।।

 

मतलब होता हार का, फिर से एक प्रयास ।

हर कोशिश में जीत की,…

Continue

Added by Sushil Sarna on January 16, 2025 at 3:00pm — 2 Comments

शर्मिन्दगी - लघु कथा

शर्मिन्दगी ....

"मैने कहा, सुनती हो ।"रामधन ने अपनी पत्नी को आवाज देते हुए कहा ।

"क्या हुआ, कुछ कहो तो सही ।"

"अरे होना क्या है । अपने पड़ोसी रावत जी की बेटी संजना ने अपने ब्वाय फ्रेंड के साथ भाग कर कोर्ट मैरिज करके इस उम्र में अपने माँ-बाप को शर्मसार कर दिया ।बेचारे! अच्छा हुआ, अपनी कोई बेटी नही केवल एक बेटा राहुल है ।" रामधन ने कहा।

इतने में डोर बेल बजी टननन ।

"कौन? " रामधन जी दरवाजे खोलते हुए बोले ।

" रामधन जी, अपने संस्कारवान बेटे को…

Continue

Added by Sushil Sarna on January 15, 2025 at 1:12pm — 6 Comments

दोहा सप्तक. . . पतंग

दोहा सप्तक . . . . पतंग

आवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग ।

बीच पतंगों के लगे, अद्भुत दम्भी जंग ।। 

 

बंधी डोर से प्यार की, उड़ती मस्त पतंग ।

आसमान को चूमते, छैल-छबीले रंग ।।

 

कभी उलझ कर लाल से, लेती वो प्रतिशोध ।

डोर- डोर की रार का, मन्द न होता क्रोध ।।

 

नीले अम्बर में सजे, हर मजहब के रंग ।

जात- पात को भूलकर, अम्बर उड़े पतंग ।।

 

जैसे ही आकाश में, कोई कटे पतंग ।

उसे लूटने के लिए, आते कई दबंग…

Continue

Added by Sushil Sarna on January 14, 2025 at 8:30pm — 2 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted a blog post

घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२ ****** घर के रिवाज चौक में जब दान हो गये उघड़े  शरीर  आप  ही  सम्मान  हो गये।१। *…See More
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Friday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
Thursday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
Thursday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
Thursday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
Wednesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
Wednesday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service