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मनोज अहसास's Blog – February 2019 Archive (1)

एक ग़ज़ल मनोज अहसास

22 22 22 22 22 22 22 2

हर लम्हा इक चोट नई थी मुझ पर क्या गुजरी होगी

मेरी हस्ती टूट रही थी मुझ पर क्या गुजरी होगी

मेरे पाँव में इक कांटे से तुझको कितना दर्द हुआ

जब तू शोलों से गुजरी थी मुझ पर क्या गुजरी होगी

जिन सपनों को हमने मालिक के हाथों में सौंपा था

उन सपनों में आग लगी थी मुझ पर क्या गुजरी होगी

सारे रस्ते आकर के जिस रस्ते पर मिल जाते हैं

उस रस्ते पर पीर घनी थी मुझ पर क्या गुजरी होगी

छोड़…

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Added by मनोज अहसास on February 8, 2019 at 12:26pm — 6 Comments

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