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Aarti Sharma's Blog (11)

रूप-सौन्दर्य

रति भी तू,कामना भी तू,                                                                  

कवि  की सुंदर कल्पना है,

प्रेम से भरी मूरत है तू,

कुदरत का कोई करिश्मा है ...

सांवली रंगत,सूरत मोहिनी,

कातिलाना तेरी अदाएं है,

सात सुरों की सरगम तू,

फूलों की महकती डाली है....

नयन तेरे काले कज़रारे है,

लब ज्यूँ मय के प्याले है,

जिन पर हम दिल हारे है,

उल्फ़ते-राज़ ये गहरे है ....

हुस्नों-हया की मल्लिका…

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Added by Aarti Sharma on February 12, 2014 at 12:30am — 15 Comments

ज़िन्दगी...

उठती टीस हृदयतल से

क्यूँ ये बेरंगी लगती है

घाव अनंत देती कभी तो

उमंगों से जीवन भरती है....

कभी लगती रति कामदेव की 

तो लगती कभी मधुशाला है 

तिनका तिनका करके बनती 

सुखद घरोंदा कभी लगती है.... 



लगती कभी  नववधू जैसी 

आलिंगन प्रेम का करती है 

कभी नाचती गोपियों जैसी

मुरली मधुर जब सुनती है .....

फिर भी ये ज़िन्दगी है

जीने का दम भरती है

शुन्य से शुरू होती…

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Added by Aarti Sharma on September 28, 2013 at 9:30pm — 12 Comments

पानी की बूँदें...

बरसे बदरा नीर बहाये

ज्यों गोरी घूँघट शरमाये

चाल चले ऐसी मस्तानी

ज्यूँ बह चली पुरवा रानी

बादल गरजे प्रेमी तड़पे

झलक तेरी को गोरी तरसे

आजा अंगना दरस दिखा जा

नयन मेरे तू शीतल कर दे

ज्यूँ घटा का रूप लेके

यूँ लटें चेहरे पर छाई

मोती सी पानी की बूंदें

छलक रही चेहरे पर ऐसे

स्पर्श तेरा स्वर्णिम पाने को

पानी की बूँदें भी तरसे.

"मौलिक व…

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Added by Aarti Sharma on July 18, 2013 at 10:30pm — 13 Comments

धर्म की राह

नींद गवांई,सुख चैन गवांया

जीवन की आपा -धापी में 

अगर-मगर तेरी-मेरी में

समय गवांया ,बातों में 

धन दौलत ने लोभी बनाया 

ईमान गवांया नोटों में 

पूत सपूत न बन पाया 

बस ध्यान लगाया माया में

दीन दुखियों की सेवा करता

पुण्य कमाता लाखों में 

करता अच्छे कर्म अगर तो 

तर जाता भाव सागर से

ईमान धर्म की राह…

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Added by Aarti Sharma on July 11, 2013 at 12:34am — 15 Comments

जुदाई

जब तू था तो सूनापन नही था

इच्छा थी पर अरमान नही था 

अश्कों में भिगो लिया दामन मैंने 

प्यासी रहूंगी फिर भी सोचा नही था...

तेरी यादों से दिन बनते थे 

और जुदाई से काली रातें

तेरे प्यार से ज़िन्दगी बनी थी

और बेवफाई से उखड़ी सांसे...

तेरे गम से मेरा गम जुदा कब था

तू नही समझा बस यही गम था

छीन लिया समय से पहले रब ने

जुदाई का गम क्या पहले कम था...

"मौलिक व…

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Added by Aarti Sharma on June 30, 2013 at 7:30pm — 16 Comments

आधी अधूरी सी ये ज़िन्दगी

तमन्नाओं से भरी हुई  

जिज्ञासाओ को छुती हुई 

पल की खबर नही 

ठूंठ की तरह खड़ी हुई

आज का पता नही

कल का ठिकाना नही

चल रही बेबाक सी 

किसी का खौफ नही

बनती बिगड़ती फिर सवंरती

कैसी खोखली ये ज़िन्दगी 

आगे दौड़ने की होड़ में रह गई पीछे 

ताश के पत्तों सी बिखरी हुई …

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Added by Aarti Sharma on April 15, 2013 at 12:00am — 15 Comments

माटी कहे कुम्हार से

माटी कहे कुम्हार से,

मुझको दे ऐसा आकार,

फिर न चक्का चढू कभी,

मिलूं संग निराकार ...

मुझे रंग दे नाम के रंग में,

पकुं मै तप की अगन में ,

सांचा ऐसा लादे मुझको ,

ढल जाऊं मै सत्कर्म में...

चिकना इतना करदे मुझे,

माया टिके न कोई इसपे,

घट ही में अविनाशी सधे,

हो जोत अंदर परकाशी रे ...

जग तारन कारण देह धरे,

सत्कर्म करे जग पाप हरे, 

चित्त न डगमग मेरा डोले,

ध्यान तेरे…

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Added by Aarti Sharma on February 23, 2013 at 8:00pm — 22 Comments

बेबसी हंसने लगी ...

बातों से भी ये गम क्यूँ कम नही होते,

आंसुओ से दिल के कोने नम नही होते.

थी बहुत उम्मीद तो अपनों से इस दिल को कभी,

पर हमेशा साथ ये हमदम नही होते...

बेबसी हंसने लगी ख़ामोशी अब है गूंजती,

बंद कमरों में कभी कोई मौसम नही होते.

जहाँ ख़ुशी वहां खिलती मन की हर कली,

उन घरानों में क्या कभी मातम नही होते...                    …

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Added by Aarti Sharma on February 17, 2013 at 10:30pm — 30 Comments

करूँ किस मुख से...

रहमत तेरी,ग़ुरबत तेरी.

करुणा निधान माया तेरी.

करूं गुणगान किस मुख से

कैसे करूँ बखान हस्ती तेरी... 

मै नादान, माया तेरी

समझ न पाई छाया तेरी

कण कण तू, ज़र्रे ज़र्रे तू 

है पत्ते पत्ते झांकी तेरी...

भवरा भी तू,और  फूल भी 

जीवन बगिया महकी मेरी 

कर नूर तेरे की बारिश से 

तर…

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Added by Aarti Sharma on February 15, 2013 at 2:00pm — 14 Comments

सुन रे अनाड़ी हमरा मनवा ...

हुई गया प्रभु से मिलनवा 

सुन रे अनाड़ी हमरा मनवा ...

लख चुरासी तूने नरक बिताया

प्रभु नाम तूने कभी नही ध्याया

अब लिया देह में जन्मवा 

सुन रे अनाड़ी हमरा मनवा ...

आठों पहर किनी चुगली निंन्दवा

कानों में घोला विष का प्याल्वा 

अब पाया प्रभु का चिन्तनवा

सुन रे अनाड़ी हमरा मनवा ...

जन्म डुबोई तूने भोग में रसनवा

कड़वी वाणी बोली कड़वा वचनवा 

अब पाया राम नाम का प्रसादवा 

सुन रे अनाड़ी…

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Added by Aarti Sharma on February 3, 2013 at 7:16pm — 15 Comments

कलयुग

मान है,सम्मान है.

पर ईमान नही.

धन है दौलत है,

पर नियत नही.

चाह आसमान में उड़ने की,

पर मेहनत नही.

मंजिले है राहे है,

पर मुसाफ़िर नही.

मंदिर है भगवान है,

पर भक्त नही.

माँ है बाप है ,

पर सेवा नही.

भाई है बहन है,

पर प्यार नही.

नेता है भ्रष्टाचार है,

पर विकास नही.

संत है सत्संग है,

पर सत्संगति नही.

जन्म है मृत्यु है,

पर भय नही.

Added by Aarti Sharma on January 30, 2013 at 11:30pm — 24 Comments

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