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मज़ारे मुसम्मन अख़रब मक्फूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊलु फ़ाइलातु मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
2 2 1 / 2 1 2 1 / 1 2 2 1 / 2 1 2

फूलों के सीने चाक हैं बुलबुल फ़रार है
सब दाग़ जल उठे हैं ये कैसी बहार है

कैसी बहार शहर में क्या मौसम-ए-ख़िज़ाँ
कारें इमारतें हैं दिलों में ग़ुबार है

कुछ बस नहीं बशर का क़ज़ा पर हयात पर
लेकिन ग़ुरूर ये है कि ख़ुद-इख़्तियार है

हाकिम है ख़ूब ख़्वाब-फ़रोशों पे मेहरबां
भाता नहीं उसे जो हक़ीक़त-निगार है

क्या ख़ूब है निज़ाम जहान-ए-ख़राब का
जिस पर फ़िदा हैं हम वो किसी पर निसार है

पाए निजात ग़म से जहां में बशर कहाँ
जो ग़म नहीं सनम का ग़म-ए-रोज़गार है

होगी शिकस्त जो भी ये बाज़ी लगाएगा
दिल की सुनाएं क्या ये बड़ा बद-क़िमार है

जाने किधर को ले गई दीवानगी हमें
बैठे हैं कब से ख़ुद का हमें इन्तेज़ार है

सुनते हैं बंट रही है ख़ुशी आज शहर में
अब छोड़िए चलें बड़ी लम्बी क़तार है

नाहक ख़फ़ा न हूजियो 'शाहिद' से साहिबो
बंदा है नेक-दिल ज़रा ग़फ़लत-शिआर है
(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on February 19, 2020 at 1:58pm

आदरणीय समर कबीर साहब, सादर प्रणाम। हौसला-अफ़ज़ाई के लिए बेहद शुक्रगुज़ार हूँ। आपकी उपस्थिति और आशीर्वाद के बाद ही ग़ज़ल मुकम्मल होती है।

Comment by Samar kabeer on February 19, 2020 at 12:02pm

जनाब रवि भसीन 'शाहिद' साहिब आदाब,बहुत अच्छी ग़ज़ल कही आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on February 18, 2020 at 4:12pm

आदरणीय लक्ष्मण भाई, आदाब। आपका ग़ज़ल तक आने के लिए और मेरा हौसला बढ़ाने के लिए तह-ए-दिल से शुक्रिया।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 18, 2020 at 3:00pm

आ. भाई रवि भसीन जी, सादर अभिवादन । बहुत खूब गजल कही, हार्दिक बधाई।

जाने किधर को ले गई दीवानगी हमें
बैठे हैं कब से ख़ुद का हमें इन्तेज़ार है

.....

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