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2122   2122   2122   22

जनाब क़तील शिफ़ाई साहब की एक ग़ज़ल 'अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको' जिसे जगजीत सिंह साहब ने गाया है उसी ग़ज़ल को गुनगुनाते हुए ये ग़ज़ल हुई है बहर थोड़ी परिवर्तित हुई है
तमाम दोस्तों को सादर समर्पित
स्वीकारें

कुछ हसीं फूलों से जीवन को सजा ले अब तो,
खुद को गुमनामी के पतझड़ से बचा ले अब तो.

मेरे जख्मों पे बड़ी तेरी इनायत होगी,
संग हाथों में कोई तू भी उठा ले अब तो.

अपनी गुल्लक को दिखा माँ को कहा बेटी ने,
है बहुत पैसे तू पापा को बुला ले अब तो.

अपने आपे में नहीं कब से मुझे क्या मालूम,
मेरे हमराही तू कैसे भी निभा ले अब तो.

पिछले मांझी की शिकायत तो बहुत करता है,
पूरी कश्ती है मगर तेरे हवाले अब तो.

मेरी आँखों में नहीं यादों के आंसू फिर भी,
मेरी ग़ज़लों को ही सीने से लगा ले अब तो.

मेरे अंदर से मिटा दे तू हवस चलने की,
मुझको देते हैं तड़प पांव के छाले हो अब तो.

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 19, 2020 at 3:29pm

आ. भाई मनोज जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on February 19, 2020 at 12:09pm

जनाब मनोज अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा हुआ है, बधाई स्वीकार करें ।

आपने ग़ज़ल के अरकान ग़लत लिख दिए हैं,इसके अरकान हैं 2122 1122 1122 22

Comment by मनोज अहसास on February 17, 2020 at 10:34am

हार्दिक आभार प्रिय मित्र शाहिद जी

सादर

Comment by रवि भसीन 'शाहिद' on February 16, 2020 at 11:16pm

प्रिय मनोज भाई, आदाब। इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल की रचना पर आपको हार्दिक बधाई।

    मेरे ज़ख़्मों पे बड़ी तेरी इनायत होगी
    संग हाथों में कोई तू भी उठा ले अब तो

आपका ये शेअर ख़ास तौर पे बहुत अच्छा लगा।

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