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2122   2122     2122    212

तोड़ने से पहले मुझको आजमा कर देख ले
अपने घर के एक कोने में सजा कर देख ले

आज भी ज़िंदा है दुनिया में वफ़ा की रोशनी
अपने आंगन में कोई पौधा लगाकर देख ले

कोई अक्षर तुझको मिल जाएगा मेरे नाम का
अपने हाथों की लकीरों को मिला कर देख ले

हौसला करने से मिल ही जाता है सब कुछ यहाँ
वक़्त की भट्टी में बस खुद को तपा कर देख ले

सबसे बढ़कर खूबसूरत कैसे हैं तेरी हया
आइने को आंखों में काजल सजाकर देख ले

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by मनोज अहसास on March 31, 2020 at 9:23pm

हार्दिक आभार आदरणीय salik साहब

सादर

Comment by मनोज अहसास on March 31, 2020 at 9:23pm

हार्दिक आभार आदरणीय अमीर साहब सादर 

Comment by मनोज अहसास on March 31, 2020 at 9:22pm

हार्दिक आभार आदरणीय समर कबीर साहब आपके निर्देशानुसार आगे से मुक्ता लगाने का प्रयास करूंगा सादर आभार

Comment by सालिक गणवीर on March 31, 2020 at 8:21pm
कोई अक्षर तुझको मिल जाएगा मेरे नाम का..
लाजवाब मिसरा, भाई मनोज अहसास, हार्दिक बधाई
Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on March 31, 2020 at 6:51pm

जनाब मनोज अह्सास जी आदाब,  ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिये

तहे-दिल से मुबारकबाद कु़बूल फरमाइये। 

Comment by Samar kabeer on March 31, 2020 at 3:58pm

जनाब मनोज अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है,बधाई स्वीकार करें ।

एक बात पहले भी कह चुका हूँ, आज भी कहता हूँ कि उर्दू शब्दों में आप जब तक नुक़्ते लगाना नहीं सीखेंगे,अच्छे ग़ज़लकार नहीं बन सकते,इस तरफ़ विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है ।

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