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दिन दीन हो चला

एक मजदूर जननी एक मजबूत जननी


कितने आलसी हो चले हैं दिन
कितनी चुस्त हो चली हैं रातें
इधर खत्म से हो चले किस्से
उधर खत्म सी हो चली बातें

जानते थे दिन कि
अब क्यों हो चले है ऐसे
जानते थे दिन कि
कभी नहीं थे ऐसे ऐसे
सुनते थे कि दिन -दिन का फेर होता है
सुनते थे कि इंसाफ मे देर हो भी जाये
सुनते थे कि इंसाफ मे अंधेर नहीं होता है

पर दिन का एक नकाब क्या उतरा
कि दिनअनजाना सा लगने लग गया
दिन के उजाले को क्या चौंधा
कि उजालों से डर लगने लग गया

रातों को पर्दे देने वाला दिन
रातों को दर्दे देने वाला दिन
दिन वही दिन दीन हो चला
मजदूर के संग चला रात भर
सुबह होते ही क्षीण हो चला

एक मजदूर जननी
एक मजबूर जननी
खुले बेबाक दिन मे
प्रसव वेदना को देती चुनौती
जब चौराहे को लजाती है
सो जाता दिन जब पर्दों मे
दोपहरी मे रात को बुलाती है
बन जाती वो वज्र सुदर्शन चक्र
उत्तरा गर्भित भ्रूण को बचाती है
हफ्तों के गहरे श्वास- उच्छवास
ले लंबे दिनो के जबरन उपवास
दधिची सी निज हाड़ गलाती है
रुकती नही ,झुकती नही
गर्भनाल काटती नहीं
गर्दन संभाले ,चलती जाती है
वो एक मजदूर जननी
वो एक मजबूर जननी
खुले दिन मे
मर्दानगी के लिए मुरदानगी
का नायाब तमगा दे जाती है
रुकती नही ,झुकती नही
गर्दन संभाले चलती जाती है
एक मजदूर जननी
एक मजबूत जननी

.............

मौलिक व अप्रकाशित"

Views: 350

Comment

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Comment by डॉ छोटेलाल सिंह on June 4, 2020 at 7:47am

आदरणीया अमिता जी बहुत ही अच्छी रचना है, आज मजदूरों की भावनाओं को समझने वाले कम हैं, सुंदर रचना के लिए बहुत बहुत बधाई

Comment by Samar kabeer on June 2, 2020 at 3:04pm

मुहतरमा अमिता तिवारी जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

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