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गीत-लोचन लोचन अश्रु बावरे बहते हैं अविराम (सरसी छंद)

विधान – 27 मात्रा, 16,11 पर यति, चरणान्त में 21 लगा अनिवार्य l कुल चार चरण, क्रमागत दो-दो चरण तुकांत l

ह्रदय बसाये देवी सीता
वन वन भटकें राम
लोचन लोचन अश्रु बावरे
बहते हैं अविराम

सुन चन्दा तू नीलगगन से
देख रहा संसार
किस नगरी में किस कानन में
खोया जीवन सार
हे नदिया हे गगन,समीरा 
ओ दिनकर ओ धूप
तृण तृण से यूँ हाथ जोड़कर
पूछ रहे सुर भूप

क्या तुमने देखा है,उसका
वैदेही है नाम
लोचन लोचन अश्रु बावरे
बहते हैं अविराम

था मेरे कर्मों का फल जो
मिला मुझे वनवास 

फिर आखिर निर्दोष मैथली 

पर क्यों टूटा त्रास
पलकों की कोरों पे बाँधा
टूट गया तटबंध
अंतस के नयनों से सारे
व्यर्थ हुए अनुबंध

राम सनेही जनक दुलारी
गई कौन से धाम
लोचन लोचन अश्रु बावरे
बहते हैं अविराम

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 21, 2020 at 7:53pm

रचना पटल पे आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं आभार आदरणीया अनामिका जी...

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 21, 2020 at 7:52pm

आदरणीय अमीरुद्दीन जी आपका बहुत बहुत आभार..सादर

Comment by Anamika singh Ana on December 19, 2020 at 7:47pm

बहुत सुंदर गीत रचा है आदरणीय , हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिये ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on December 19, 2020 at 3:40pm

 जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब, सुंदर गीत की रचना हुई है, हृदय तल से बधाईयाँ प्रस्तुत करता हूँ। सादर। 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 14, 2020 at 10:05pm

एक प्रार्थना है...अगर कमियों को इंगित करेंगे तो सुधार और सीखने में आसानी होगी..सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 14, 2020 at 10:04pm

आदरणीय धामी जी गीत पे आपके सुन्दर शब्दों से मन में उत्साह का नव संचार हुआ...धन्यवाद

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 14, 2020 at 7:41pm

आ. भाई ब्रिजेश जी, सादर अभिवादन । गीत का प्रयास अच्छा हुआ है । हार्दिक बधाई ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on December 12, 2020 at 9:44pm

रचना पटल पे आपका स्वागत संग आभार आदरणीय समर जी...

Comment by Samar kabeer on December 11, 2020 at 3:17pm

जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज' जी आदाब, गीत का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

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