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ग़ज़ल: खिड़की पे माहताब बैठा है।

2122 1212 22

आँख में भरके आब बैठा है।
खिड़की पे माहताब बैठा है।

**

रातभर वाट्सऐप पे है लड़ा
नोजपिन पे इताब बैठा है।

**

सुर्ख़ आँखें अफ़ीम हों गोया
पलकों को ऐसे दाब बैठा है।

**

यूँ ग़ुलाबी सी शॉल है ओढ़े
जैसे कोई गुलाब बैठा है।

**

धूप में खिल रही हैं पंखुरियाँ
खुश्बू में लिपटा ख़्वाब बैठा है।

**

सुब्ह से पढ़ रहा हूँ मैं उसको'
और वो लेके किताब बैठा है।

*************************

मौलिक व अप्रकाशित

*************************

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Comment

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Comment by Samar kabeer on March 8, 2021 at 6:05pm

 //  सुबह को मैंने जान बूझकर 12 को वज्न पर रक्खा है//

ऐसा क्यों ?


Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 7, 2021 at 11:53pm

शुक्रिया आ. नाथ सोनांचली जी। बिल्कुल।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 7, 2021 at 11:51pm

आ. रचना जी आपका बेहद आभार सुखन नवाजी के लिए।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 7, 2021 at 11:50pm

आ. समर सर हौसलाफजाई के लिए बेहद शुक्रिया। जी सर वहां "" हों """ ही होना चाहिए सुधार कर रहा हूँ। सुबह को मैंने जान बूझकर 12 को वज्न पर रक्खा है आदरणीय।

Comment by नाथ सोनांचली on March 7, 2021 at 8:20pm

आद0 जान गोरखपुरी जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही आपने। उस्ताद समर साहिब की बातों का संज्ञान लीजियेगा।बधाई निवेदित करता हूँ।

Comment by Rachna Bhatia on March 2, 2021 at 7:06pm

आदरणीय कृष मिश्रा जी नमस्कार। बेहतरीन ग़ज़ल हुई वाह वाह वाह।

Comment by Samar kabeer on March 2, 2021 at 6:57pm

जनाब जान गोरखपुरी जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

नाब जान गोरखपुरी जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'सुर्ख़ आँखें अफ़ीम हो गोया'

इस मिसरे में 'हो' को "हों" कर लें ।

'पढ़ रहा हूँ सुबह से मैं उसको'

इस मिसरे में सहीह शब्द "सुब्ह" है और इसका वज़्न 21 होता है,मिसरा यूँ कर सकते हैं:-

'सुब्ह से पढ़ रहा हूँ मैं उसको'

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