अरे ये क्या किया आपने, वक्त ज़रूरत के लिए एक ज़मीन थी वो भी बेच दी कल को बेटी की शादी करनी है और रिटायरमेंट के बाद के लिए कुछ सोचा है । एक सहारा था वह भी चला गया ।
अरे भाग्यवान, बेटी के इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन के लिए ही तो बेचा है, और बुढ़ापे का सहारा ये ज़मीन जायजाद नहीं हमारे बच्चे हैं और उनकी तरबियत की जिम्मेदारी हमारी है । रही बात शादी की तो, न लड़की की शादी में दहेज़ देंगे, न लड़के की शादी में दहेज़ लेंगे
हिसाब बराबर है, न लेना एक न देना दो ।
मौलिक एवं अप्रकाशित
Comment
आदरनीय सौरभ सर बहुमूल्य ज्ञान वर्धक टिप्पणी के लिए आभार, समयाभाव और चिंतन में कमि (विषय को गहराई से न सोचना ) की वजह से कथ्य में सुदृणता नहीं आ रही है | आगे इस बात का ध्यान रखूँगा बहुत आभार आपका। .....
नादिर भाई, आपकी यह लघुकथा भावनात्मक तौर पर अच्छी है लेकिन कथ्य को और कसावट दी जानी चाहिए. ऐसे संवादों से पात्रों की बुद्धिमानी और उनकी जागरुकता तो झलकती है लेकिन कथात्मकता पीछे छूट जाती है. आप कथ्य और उसके प्रस्तुतीकरण में थोड़ी नाटकीयता समाविष्ट करें, जो कि कथाओं का अहम भाग हुआ करता है, तो यह लघुकथा अवश्य ही स्मरणीय होगी. यानी, लघुकथा प्रासंगिक हो उठेगी.
विश्वास है मेरी टिप्पणी में आप समालोचना और सकारात्मकता देखेंगे.
शुभेच्छाएँ
अच्छी लघु कथा के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीय नादिर खान जी।
आदरणीय सुनील जी रचना पर आपकी सकारात्मक टिप्पणी से लेखन सार्थक हुआ ।
आदरणीय जी समाज को दहेज़ विरोधी सन्देश देती इस सुंदर लघु कथा के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें।
आदरणीय उस्मानी साहब आपको रचना पसंद आयी, रचना कर्म सफल हुआ बहुत बहुत शुक्रिया आपका ....
आदरणीय लक्ष्मण साहब हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया|
स्नेह बनाये रखें |
कृपया ज़मीन जायजाद को ज़मीन जायदाद पढ़ें ।
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