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“यार बड़ी दिक्कत है आजकल.”

“क्यों क्या हुआ.”

“रोज़ धर्म और देश भक्ति को लेकर बवाल हुआ करता है.”

“जब कुछ करने को न हो तब ऐसी छोटी-छोटी चीज़ें टाइम पास का अच्छा साधन होती हैं.”

“तुम्हारे कहने का मतलब जो कुछ भी आजकल हो रहा, सब टाइम पास है?”

“बिलकुल.”

“परसों जो लड़कों में मारपीट हुई, पुलिस ने लाठीचार्ज किया, मीडिया में बवाल मचा हुआ है, सब टाइम पास है?”

“बिलकुल है भाई. इसके अलावा इस बवाल का मतलब क्या है? तुम्हें कुछ सार्थकता दिखती है? नारे क्या देश प्रेम का पैमाना हैं?”  

“यानी तुम्हारे कहने का अर्थ है कि जो देश विरोधी नारे लगा रहे हैं, वह सही कर रहे हैं.”

“नहीं, लेकिन क्या जो देश के समर्थन में नारे लगा रहे हैं, वह ही देशभक्त हैं? यही आज की बड़ी विसंगति है कि सब नारों में ही सिमट रहा है.”

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Saurabh Pandey on June 20, 2019 at 3:30pm

सिक्का अगर खोटा हो तो उसके दोनों पहलू खोटे होते हैं. इस बात की तस्दीक करती इस रचना के लिए हार्दिक बधाई, बृजेश भाई.

शुभातिशुभ

Comment by vijay nikore on June 18, 2019 at 2:25pm

रचना अच्छी लगी, बधाई बृजेश जी

Comment by बृजेश नीरज on June 13, 2019 at 11:06am

प्रतिभा पाण्डे जी आपका बहुत आभार 

Comment by बृजेश नीरज on June 13, 2019 at 11:05am

समर कबीर जी आपका हार्दिक आभार 

Comment by बृजेश नीरज on June 13, 2019 at 11:05am

नीलम उपाध्याय जी आभार आपका 

Comment by Neelam Upadhyaya on June 12, 2019 at 2:52pm

आदरणीया बृजेश नीरज जी, बढ़िया समसामयिक रचना की प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Samar kabeer on June 11, 2019 at 12:35pm

जनाब बृजेश नीरज जी आदाब,अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by pratibha pande on June 10, 2019 at 10:33am

कुछ तत्व अपने स्वार्थ के लिये मुद्दे गर्माये रखना चाहते हैं।  सामयिक विषय लिये प्रभावशाली रचना। हार्दिक बधाई आपको

कृपया ध्यान दे...

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