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2122 2122 212

दर्द को दिल में दबाना सीख लो
ज़िन्दगी में मुस्कराना सीख लो

आंख से आंसू बहाना छोड़िये
हर मुसीबत को भगाना सीख लो

ज़िन्दगी है खेल, खेलो शान से
खेल में खुद को जिताना सीख लो

फूल को दुनिया मसल कर फैंकती
खुद को कांटों सा दिखाना सीख लो

छोड़ दें अब गिड़गिड़ाना आप भी
कुछ तो कद अपना बढ़ाना सीख लो

थी जवानी जोश भी था स्वप्न भी
दिन पुराने अब भुलाना सीख लो

कौन ‘‘मेठानी’’ किसी को पूछता
तुम जमाने को झुकाना सीख लो

( मौलिक एवं अप्रकाशित )
- दयाराम मेठानी

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Comment by Dayaram Methani on July 7, 2019 at 11:41pm

आदरणीय समर कबीर जी, अजय तिवारी जी की टिप्पणी के समय मुझे शतुर गुरबा के बाबत कुछ याद नहीं आया। इसलिए  उनसे जानकारी बाबत निवेदन किया फिर मुझे याद आया कि इस बाबत कभी चर्चा की थी तो मैने उसे ढूंढा आैर जो आपने बताया वो मुझे नोट किया हुआ मिल गया। उसे पढ़ने के बाद मुझे अहसास हुआ कि अजय तिवारी जो ने जो टिप्पणी की वह बिलुकल सही थी आैर उसके बाद मैने रचना में सुधार कर लिया है। आपका आैर अजय तिवारी जी का आभारी हूं। कृपया मार्गदर्शन करते रहें। सादर।

Comment by Samar kabeer on July 7, 2019 at 12:29pm

जनाब दयाराम जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

जनाब अजय तिवारी जी से सहमत हूँ,आपको याद हो तो कुछ दिन पहले "शुतरगुरबा" के बारे में आपको विस्तार से बता चुका हूँ ।

Comment by Dayaram Methani on July 6, 2019 at 1:08pm

आदरणीय लक्ष्मण धामी जी,  प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत आभार।

Comment by Dayaram Methani on July 6, 2019 at 1:06pm

आदरणीय अजय तिवारी जी, रचना पर विस्तृत समीक्षा एवं सुझाव के लिए बहुत बहुत आभार। आपने शतुर गुर्बा दोष बताया है। मुझे इसके बारे में संभवत: पूरी जानकारी नहींं है। अत: आपसे निवेदन है कि इस रचना में जहा जहां आपने यह दोष बताया हे वो कैसे उत्पन्न हुआ है इस बारे में मार्ग दर्शन करेंगे तो आपका आभारी रहूंगा। सादर।

Comment by Ajay Tiwari on July 6, 2019 at 9:53am

आदरणीय दयाराम जी, अच्छे शेर हुए हैं. हार्दिक बधाई. लेकिन कुछ शेरों को अभी और वक्त देने की ज़रुरत है. मसलन ये शेर :   

आंख से आंसू बहाना छोड़िये > शुतुर गुर्बा है. 'छोड़िये' की जगह 'छोड़ कर' रखा जा सकता है.   
हर मुसीबत को भगाना सीख लो

छोड़ दें अब गिड़गिड़ाना आप भी > शुतुर गुर्बा है. "छोड़ कर अब गिड़गिड़ाने की अदा" किया जा सकता है.
कुछ तो कद अपना बढ़ाना सीख लो

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 6, 2019 at 9:41am

आ. भाई दयाराम जी, अच्छी गजल हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by Dayaram Methani on July 5, 2019 at 9:27pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय गिरिराज भंडारी जी।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 5, 2019 at 11:37am

अच्छी ग़ज़ल कही आदरणीय .. बधाई !

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