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शूल सम यूँ खुरदरे ही रह गये जीवन में सच-लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२


आँख से काजल चुराने का न कौशल हम में था
दूर रह कर  याद आने  का न कौशल हम में था।१।
**

नाम पेड़ों पर तो हम भी लिख ही लेते थे मगर

पुस्तकों में खत छिपाने का न कौशल हम में था।२।
**
दोस्ती  सूरज  सितारों  से   तो  अपनी थी गहन 
चाँद को लेकिन रिझाने का न कौशल हम में था।३।
**

पा  गये  विस्तार  तो  हम  सिन्धु  जैसे  हो  गए 
प्यास प्यासों की बुझाने का न कौशल हम में था।४।

**

शूल सम जीवन में हम तो  खुरदरे  ही  रह गये

फूल सा खुद को बनाने का न कौशल हम में था।५।

मौलिक-अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 24, 2020 at 5:47pm

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर आपकी उपस्थिति और मनभावन टिप्पणी से मन प्रफुल्लित हुआ। स्नेह के लिए हार्दिक आभार..

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 24, 2020 at 5:43pm

आ. भाई नीलेश शेवगाँवकर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति, सराहना व उत्तम सुझाव के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by सालिक गणवीर on September 24, 2020 at 4:59pm

भाई लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी

सादर प्रणाम

एक और पठनीय हिंदी ग़ज़ल के लिए टनों बधाइयाँ स्वीकार करें.

Comment by Nilesh Shevgaonkar on September 24, 2020 at 11:16am

वाह वाह लक्ष्मण जी .. आज तो ग़ज़ब कर दिए आप ..
बहुत ख़ूब.. एक दो साधारण सुझाव ,,
.
दूर रह कर  याद आने  का न कौशल हम में था।१।

नाम पेड़ों पर तो हम भी लिख ही लेते थे मगर
दोस्ती  सूरज- सितारों  से  तो अपनी थी गहन 


पा गये विस्तार  तो  हम  सिन्धु  जैसे हो गए 
प्यास प्यासों की बुझाने का न कौशल हम में था

शूल सम जीवन में हम तो  खुरदरे  ही  रह  गये  
.

कुछ सुझाव हैं जिनसे ग़ज़लियत बढ़ जाएगी..
बहुत बहुत बधाई 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 24, 2020 at 9:47am

आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 24, 2020 at 9:46am

आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन ।गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए आभार ।

Comment by Chetan Prakash on September 23, 2020 at 9:51pm

साफ सुथरी हिन्दी ग़ज़ल, बधाई ! उद्धरणीय हो सकती थी, मकते के साथ।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on September 23, 2020 at 8:23pm

जनाब लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ। सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 23, 2020 at 5:25pm

आ. रचना बहन , सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व सराहना के लिए धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 23, 2020 at 5:24pm

आ. भाई समर कबीर जी, सादर अभिवादन । आपकी उपस्थिति व स्नेह पाकर गजल मुकम्मल हुई । हार्दिक आभार ।

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