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गजल -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२१२२/२१२२/२१२२
*
मत कहो अब मन खँगाला जा रहा है
इस वतन से  बस  उजाला जा रहा है ।१।
*
फिर दिखेगा मौत का मन्जर वृहद ही
कह सुधा नित विष उबाला जा रहा है।२।
*
आसमाँ को बाँटने की हो न साजिस
जो भी नारा अब उछाला जा रहा है।३।
*
हस्र क्या होगा उन्हें भी ज्ञात होगा
जानकर जब साँप पाला जा रहा है।४।
*
बँट रहा नित किन्तु सब के पेट खाली
पास किस के फिर निवाला जा रहा है।५।
*
मान मर्दन के सिवा कुछ भी नहीं यह
जिन के हाथों  से  शिवाला जा रहा है।६।
*
कब्र को सदियों सँभाला पूछते अब
जिन्न उससे क्यों निकाला जा रहा है।७।
*
सूखने के हैं नहीं  आसार कुछ भी
मट्ठा जिसकी जड़ में डाला जा रहा है।८।
*
मौलिक अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 28, 2022 at 7:08am

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति, उत्साहवर्धन व मार्गदर्शन के लिए आभार।

Comment by Samar kabeer on November 24, 2022 at 6:54pm

जनाब लक्ष्मण शामी जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें I 

'फिर दिखेगा मौत का मन्जर वृहद ही'---इस मिसरे में 'मन्जर' को "मंज़र" कर लें I 

'आसमाँ को बाँटने की हो न साजिस'--- इस मिसरे में 'साजिस' को "साज़िश" कर लें I 

'हस्र क्या होगा उन्हें भी ज्ञात होगा'----इस मिसरे में 'हस्र ' को "हश्र" कर लें I 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 24, 2022 at 3:47pm

आ. राखी जी, अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद। 

Comment by Rakhee jain on November 24, 2022 at 1:26am

बहुत सार्थक सृजन आदरणीय

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