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आज राखी बँध रहे थे, खूब राखी बँध रहे थे,

भाई भी सब सज रहे थे, पहन कुरते जँच रहे थे!

हीरे – मोती सोने – चाँदी, से सजे रेशम के धागे,

सोचने को पर बहुत कुछ इस सजावट से है आगे,

मन ही मन वादे कई हैं कुछ तो खुलकर भी कही हैं,

पर अधूरे रह गए जो वो ह्रदय में धँस रहे हैं!

यूँ तो हम हैं तीन भाई तीन बहनें भी हैं पाईं,

बहनें सारी बड़ी मुझसे, कष्ट में ना टरीं मुझसे,

कोई जो तकलीफ आई काली बदरी कोई छाई,

माँ से पहले खड़ी डटकर और हिम्मत भी बँधाई,

आज दुख से एक भरी है, उसपे मुश्किल यूँ पड़ी है,

चल बसे धन प्राण उसके, पूत एक जो दूर ही है!

जब ये दुर्घटना घटी थी, धरती ही मानो फटी थी,

हाय न कुछ कर सके थे, तीन उसके जो सगे थे,

खूब ढाढ़स ही बँधा कर, लौट अपने घर गए थे!

इक हमारी माँ बेचारी, उसने कोशिश कर ली सारी,

क्षीण तन दुःख सह न पाया, रोग पाकर वो भी हारी!

अब बहन रहती अकेली, खुद ही खुद की है सहेली,

किंतु राखी बँध रहे हैं, खूब राखी बँध रहे हैं!

भाई भी सब सज रहे हैं, पहन कुरते जँच रहे हैं!

- श्याम किशोर सिंह 'करीब' (मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 11, 2017 at 9:32pm

बहुत धन्यवाद श्री Laxman Dhami जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on August 11, 2017 at 7:05am
सुदर...हार्दिक बधाई।
Comment by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 8, 2017 at 9:51pm

सादर नमस्कार आदरणीया KALPANA BHATT जी। प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार! निजी अनुभवों को पद्य में ढालकर लिखने की कोशिश कर रहा हूँ।

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 8, 2017 at 9:06pm

अच्छे भाव वाली कविता हुई है आदरणीय श्याम जी | बधाई स्वीकारें |

Comment by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 8, 2017 at 6:50pm
नमस्कार आरिफ साहब। बहुत बहुत धन्यवाद। किसी विधा में लिखते का मायने समझ नहीं आया,कृपया स्पष्ट करें।
Comment by श्याम किशोर सिंह 'करीब' on August 8, 2017 at 6:47pm
सादर प्रणाम समर कबीर साहब। प्रोत्साहन के लिए बहुत आभार।
Comment by Mohammed Arif on August 8, 2017 at 5:33pm
आदरणीय श्याम किशोर जी आदाब, राखी पर्व की धूम , मस्ती-उल्लास , उमंग , तैयारियों आदि को आपने बेहतरीन तरीक़े से उकेरा है । आप इस रचना को किसी विधा में लिखते तो और मज़ा आ जाता । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Samar kabeer on August 8, 2017 at 4:12pm
जनाब श्याम किशोर सिंह'क़रीब'जी आदाब, अच्छे भाव समेटे आपने कविता में,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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