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"माया और काया" -- [लघु कथा-10]

"माया और काया" - (लघु कथा)

"वाकई बहुत अच्छा गुजरा यह एक घंटा पार्क में ... पर अब तो बताओ, तुम ने लेगी-जीन्स वगैरह छोड़ कर आज मेरी पसंद की ये साड़ी क्यों पहनी ?"-अपने पति के इस सवाल को अनसुना सा कर मालती उसे काफी दिनों बाद एक टक देख रही थी।

"पीयूष, तुम सचमुच सुंदर हो, सूरत से ....और... सीरत से भी !" अपना सिर उसकी गोदी में रखकर वह बोलती गई-"मेरे बिना मेकअप वाले सादे रूप में जिस सहजता से मुझे निहारते हुये जब तुम मुझसे बातें करते हो न, तो... तो पता नहीं क्यों मुझे अजीब सी सुखद अनुभूति होती है, लेकिन वो खुशी जो वहाँ मिलती है न ,वो कितनी क्षणिक और नकली सी होती है !"

"तुम ये कह क्या रही हो, ये तुम्हारा बदला सा ऐटीट्यूड, सच बताओ बात क्या है ?"

"नहीं, अब मैं कभी नहीं जाऊंगी.. किटी तो क्या किसी भी पार्टी-शार्टी में नहीं जाऊंगी !" मालती की सांसें कुछ तेज हो रही थीं ।"...सब माया है... 'माया' और 'काया' ..बस घूरती निगाहें ..चाहे 'मर्द' हो या 'औरत' ! बस होड़बाज़ी,हँसी-ठिठोली और नज़दीकियां, कभी इस तो कभी उस बहाने"- पीयूष का हाथ थामे मालती ने कहा-" तुम्हारी सादग़ी में ही मेरा सच्चा सुख है, हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं हुआ करती !"

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on April 7, 2017 at 10:25pm
मेरी इस ब्लोग-पोस्ट पर समय देकर प्रोत्साहित करने के लिए तहे दिल से बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय तेजवीर सिंह जी, आदरणीय डॉ. गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी, आदरणीय सतविंदर कुमार जी, आदरणीय सुशील सरना जी और आदरणीय ओम प्रकाश क्षत्रिय प्रकाश जी। विलंब से उत्तर देने के लिए क्षमा चाहता हूँ।
Comment by Omprakash Kshatriya on October 7, 2015 at 7:21pm

आदरणीय  शेख जी यह लघुकथा वाकई  अच्छी  बनी है . बधाई .

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 6, 2015 at 8:10pm

कथ्य उभर कर आया है .

Comment by Sushil Sarna on October 6, 2015 at 6:49pm

प्रेम की आत्मीय अनुभूति को चित्रित करती इस लघुकथा के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय। 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 6, 2015 at 5:56pm
सच में 'सादगी में ही सच्चा सुख है।' बहुत सुंदर आदरणीय
Comment by TEJ VEER SINGH on October 6, 2015 at 5:18pm

हार्दिक बधाई आदरणीय शेख शहज़ादी उस्मानी  जी! बहुत अच्छी  लघुकथा!

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