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गज़ल इस्लाह के लिए (2122-2122-2122-212)

मेरी आँखों में नज़र ये ढूँढती क्या चीज़ है
कुछ तो बतला दे कि तेरी खो गई क्या चीज़ है ॥

रात दिन सीने की दीवारों पे ये पटके है सर
ऐ खुदा इस बुत में तूने डाल दी क्या चीज़ है ॥

हिज्र में जिस ने सुनी हों ग़ज़लें तन्हा बैठ कर
उससे जाकर पूछिए ये शायरी क्या चीज़ है ॥

तेरे ख्वाबों से उठा तुझ को न पाया सामने
अब समझ में आ रहा है तिश्नगी क्या चीज़ है ॥

यूँ तो जीने का तजुर्बाहै बहुत हम को मगर
अब तलक समझे नहीं हैं ज़िंदगी क्या चीज़ है ॥

नाम है गुरप्रीत सिंह है शौक लिखने का मुझे
ओ बी ओ पर सीखता हूँ शायरी क्या चीज़ है ॥

.
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Ravi Shukla on April 5, 2017 at 3:07pm

आदरणीय गुरप्रीतजी बहुत बढि़या गजल कही आपने

इस पर काफी चर्चा हो चुकी है जिससे निश्चित ही आपको लाभ हाेगा खुशी की बात ये है कि आप गजल कहना सीखने के प्रति ईमानदार है । रात दिन सीने में  ..... ये शेर बहुत अच्‍छा लगा हमें भी इसके लिये अलग से बधाई ।  पाचवें शेर में तज्रिबा पर बात हो ही गई है पढते समय इसके सानी मिसरे में हमें  लगा कि हैं को हम से बदला जाए तो शायद बात और बेहतर हो सकती है ।

अब तलक समझे नहीं हम जिंदगी क्‍या चीज है ।    मकते का माूसम सा हौसला बहुत अच्‍छा लग रहा है । मुबारक बाद हाजिर है ।

Comment by Samar kabeer on April 1, 2017 at 10:46pm
जी,212 ही होगा ।
भाई निलेश जी के कहे मुताबिक़,'पूछियेगा'बहुत उम्दा रहेगा ।
Comment by Gurpreet Singh jammu on April 1, 2017 at 9:15pm
यह भी ठीक है नीलेश सर जी
Comment by Nilesh Shevgaonkar on April 1, 2017 at 8:33pm

पूछियेगा कर लें...थोडा लोच आ जाएगा 

Comment by Gurpreet Singh jammu on April 1, 2017 at 6:47pm
शुक्रिया आदरणीय समर कबीर जी..'पूछिए ये' की जगह 'पूछ लेना' ही बेहतर रहेगा..
क्या तज्रिबा का वज्न भी 212 ही होगा ??
Comment by Samar kabeer on April 1, 2017 at 6:40pm
जनाब गुरप्रीत सिंह जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

'उससे जाकर पूछिये ये शाइरी क्या चीज़ है'
इस मिसरे में 'पूछिये ये'कुछ ठीक नहीं लगता इसे यूँ कीजिये तो गेयता बहतर हो जायेगी :-
"उससे जाकर पूछ लेना शाइरी क्या चीज़ है"
बाक़ी जनाब निलेश भाई बता ही चुके हैं ।
हाँ एक बात ये कि 'तजुर्बा'और 'तज़रबा'दोनों ग़लत हैं,सही शब्द है "तज्रिबा" देखियेगा ।
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on April 1, 2017 at 5:27pm
आदरणीय गुरप्रीत जी,हारदिक बधाई इस खूबसूरत गजल के लिए।
पटके शब्द बहुवचन है,इसलिए हैं शब्द सही होना चाहिए।सादर
Comment by Mohammed Arif on April 1, 2017 at 2:25pm
आदरणीय गुरप्रीत जी आदाब, उम्दा ग़ज़ल के लिए दीली मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए ।
Comment by Gurpreet Singh jammu on April 1, 2017 at 1:57pm
आदरणीय नीलेश जी

"ख्वाब से जागा तेरे तुझ को न पाया सामने"

अगर ऐसा करूँ तो क्या ठीक रहेगा???
Comment by Gurpreet Singh jammu on April 1, 2017 at 1:39pm
इस कोशिश को पसंद करने के लिए शुक्रिया आदरणीय शिज्जू जी..
जी बिल्कुल आदरणीय नीलेश जी ने मेरी बहुत सी मुश्किलें हल कर दी हैं.

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