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जाल .... ( 4 5 0 वीं कृति)

जाल .... ( 4 5 0 वीं कृति)

बहती रहती है
एक नदी सी
मेरे हाथों की
अनगिनित अबोली रेखाओं में
मैं डाले रहता हूँ एक जाल
न जाने क्या पकड़ने के लिए
हाथ आती हैं तो बस
कुछ यातनाएँ ,दुःख और
काँच की किर्चियों सी
चुभती सच्चाईयाँ
डसते हैं जिनके स्पर्श
मेरे अंतस में बहती
जीत और हार की धाराओं को
काले अँधेरों में भी मुझे
अव्यक्त अभियक्तियों के रँग
वेदना के सुरों पर
नृत्य करते नज़र आते हैं
नदी
हाथों की रेखाओं में
अविरल बहती रहती है
जाल में
सब कुछ मिलता है
मगर
नहीं मिलती तो बस
ज़िंदगी नहीं मिलती
जाल
स्वयं से लिपट जाता है
ज़िंदगी को ढूंढता इंसान
पानी सा बिखर जाता है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on May 1, 2019 at 3:56pm

आदरणीय राज नवादवी साहिब, आदाब। .... सृजन के भावों को आत्मीय मान देने का तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by राज़ नवादवी on May 1, 2019 at 12:27pm

आदरणीय सुशील सरना जी, बहुत बहुत बधाई. सुन्दर रचना और लेखन कार्य में एक मुकाम हासिल करने, दोनों के लिए. सादर 

Comment by Sushil Sarna on April 29, 2019 at 8:06pm

आदरणीय समर कबीर साहिब, आदाब .... आपकी आत्मीय प्रशंसा ने सृजन को आहत होने से बचा लिया। आपका तहे दिल से शुक्रिया। आपके अस्वस्थ होने का सुनकर मैं चिंतिति हूँ। अल्लाह आपको अच्छी सेहत बख्शे।

Comment by Samar kabeer on April 29, 2019 at 3:38pm

जनाब सुशील सरना जी आदाब,आप तो जानते हैं कि जब मैं बीमार होता हूँ तब ही मंच पर नहीं आ पाता,अन्यथा हाज़िरी पूरी रहती है ।

आपकी 450 वीं कविता भी हमेशा की तरह बहुत ख़ूब हुई है,इस कृति के लिए दो बार बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Sushil Sarna on April 29, 2019 at 12:43pm

४५०वीं कृति मंच के स्नेह से तृषित। इतनी उपेक्षा के बाद शायद इसका जाना ही उचित होगा। क्षमा सहित प्रणाम।

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