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बैठी हैं घर किये वहाँ अब तो रुदालियाँ -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२२१/२१२१/१२२१/२१२

कहने को जिसमें यार हैं अच्छाइयाँ बहुत

पर उसके साथ रहती हैं बरबादियाँ बहुत।१।

**

सजती हैं जिसके नाम से चौपाल हर तरफ

सुनते हैं उस  को  भाती  हैं तन्हाइयाँ बहुत।२।

**

कैसे कहें कि गाँव को दीपक है मिल गया

उससे ही लम्बी  रात  की परछाइयाँ बहुत।३।

**

पाँवों तले समाज को करके बहुत यहाँ 

चढ़ता गया है आदमी ऊँचाइयाँ बहुत।४।

**

बैठी हैं  घर  किये  वहाँ  अब  तो रुदालियाँ

बजती थी जिस भी गाँव में शहनाइयाँ बहुत।५।

मौलिक-अप्रकाशित

लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 15, 2020 at 8:20pm

आ. भाई समर कबीर जी, सादर अभिवादन ।गजल पर उपस्थिति स्नेह व मार्गदर्शन के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 15, 2020 at 8:19pm

आ. भाई हर्ष महाजन की , सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by Samar kabeer on September 15, 2020 at 11:59am

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'रहती हैं साथ उसके पर बरबादियाँ बहुत'

ये मिसरा बह्र में नहीं है, यूँ कर सकते हैं:-

'पर उसके साथ रहती हैं बरबादियाँ बहुत'

Comment by Harash Mahajan on September 14, 2020 at 9:53am

आदरनीय भाई  लक्ष्मण धामी जी आदाब । बहुत सुंदर सृजन ।

"सजती हैं जिसके नाम से चौपाल हर तरफ

सुनते हैं उस  को बेहतरीन ।

भाती  हैं तन्हाइयाँ बहुत"

सादर

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