आँख से काजल चुराने का न कौशल हम में था
दूर रह कर याद आने का न कौशल हम में था।१।
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नाम पेड़ों पर तो हम भी लिख ही लेते थे मगर
पुस्तकों में खत छिपाने का न कौशल हम में था।२।
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दोस्ती सूरज सितारों से तो अपनी थी गहन
चाँद को लेकिन रिझाने का न कौशल हम में था।३।
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पा गये विस्तार तो हम सिन्धु जैसे हो गए
प्यास प्यासों की बुझाने का न कौशल हम में था।४।
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शूल सम जीवन में हम तो खुरदरे ही रह गये
फूल सा खुद को बनाने का न कौशल हम में था।५।
मौलिक-अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
Comment
आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन । गजल पर आपकी उपस्थिति और मनभावन टिप्पणी से मन प्रफुल्लित हुआ। स्नेह के लिए हार्दिक आभार..
आ. भाई नीलेश शेवगाँवकर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति, सराहना व उत्तम सुझाव के लिए हार्दिक आभार ।
भाई लक्ष्मण धामी मुसाफ़िर जी
सादर प्रणाम
एक और पठनीय हिंदी ग़ज़ल के लिए टनों बधाइयाँ स्वीकार करें.
वाह वाह लक्ष्मण जी .. आज तो ग़ज़ब कर दिए आप ..
बहुत ख़ूब.. एक दो साधारण सुझाव ,,
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दूर रह कर याद आने का न कौशल हम में था।१।
नाम पेड़ों पर तो हम भी लिख ही लेते थे मगर
दोस्ती सूरज- सितारों से तो अपनी थी गहन
पा गये विस्तार तो हम सिन्धु जैसे हो गए
प्यास प्यासों की बुझाने का न कौशल हम में था
शूल सम जीवन में हम तो खुरदरे ही रह गये
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कुछ सुझाव हैं जिनसे ग़ज़लियत बढ़ जाएगी..
बहुत बहुत बधाई
आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद ।
आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन ।गजल पर उपस्थिति और सराहना के लिए आभार ।
साफ सुथरी हिन्दी ग़ज़ल, बधाई ! उद्धरणीय हो सकती थी, मकते के साथ।
जनाब लक्ष्मण धामी मुसाफिर जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ। सादर।
आ. रचना बहन , सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति व सराहना के लिए धन्यवाद ।
आ. भाई समर कबीर जी, सादर अभिवादन । आपकी उपस्थिति व स्नेह पाकर गजल मुकम्मल हुई । हार्दिक आभार ।
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