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समझा बताओ किसने किताबों ने जो कहा-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

२२१/२१२१/१२२१/२१२

लिक्खा सजा के हम ने उजालों ने जो कहा
लाया  मगर  अमल  में  अँधेरों  ने जो कहा।१।
**
बैठक में ला के रख दी वो शोभा बढ़ाने को
समझा बताओ किसने किताबों ने जो कहा।२।
**
देखा जो उसको मान के आँखों का धोखा है
जाना  अमर  है  सत्य  हवाओं  ने  जो  कहा।३।
**
सोचा ही था कि शाप के परिणाम आ गये
आया असर  न  एक  दुआओं ने जो कहा।४।
**
इस दौर कह के झूठ है अन्नों की बात को
सच कह रही है  देह  दवाओं ने जो कहा।५।

**

किसने गिने  विवाह  में  आशीष  कितने हैं
भाया हिसाब सबको लिफाफों ने जो कहा।६।
**
अपनों की बात माने मुसाफिर नहीं मगर
पत्थर की है  लकीर  परायों  ने जो कहा।७।

लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"
मौलिक /अप्रकाशित

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 18, 2021 at 6:30pm

आ. भाई गिरधारी सिंह जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति ,स्नेह व भूरीभूरी प्रशंसा लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' on June 17, 2021 at 8:51pm

क्या बात क्या बात क्या बात 

Comment by Samar kabeer on June 6, 2021 at 6:34pm

'अन्नों की बात लोक में ठहरा के झूठ अब'

ठीक है अब ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 6, 2021 at 6:30pm

आ. भाई समर जी सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और सुझाव के लिए हार्दिक आभार।
इंगित मिसरे को यूँ किया है । देखिएगा...


अन्नों की बात लोक में ठहरा के झूठ अब

Comment by Samar kabeer on June 6, 2021 at 3:59pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें ।

'लिक्खा सजा के हम ने उजालों ने जो कहा
लाया  मगर  अमल  में  अँधेरों  ने जो कहा'

मतले में शुतर गुरबा दोष है है,सानी में 'लाया' शब्द को "लाये" करने से ऐब निकल जाएगा ।

'बैठक में ला के रख दी वो शोभा बढ़ाने को'

सानी में 'किताबों' शब्द बहुवचन है इसलिये इस मिसरे को यूँ कहना उचित होगा:-

'बैठक में लाके रख तो दीं शोभा बढ़ाने को'

'इस दौर कह के झूठ है अन्नों की बात को'

इस मिसरे में वाक्य विन्यास ठीक नहीं,बदलने का प्रयास करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 6, 2021 at 12:40pm

आ. भाई रवि शुक्ला जी, सादर अभिवादन।गजल पर उपस्थिति व उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद।

Comment by Ravi Shukla on June 5, 2021 at 9:24pm

आदरणीय लक्षमण जी इस उम्दा गजल के लिये हार्दिक बधाई पेश  है  नया जोड़ा गया शेर बहुत अच्छा लगा  फिर से मुबारक बाद 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 4, 2021 at 9:56am

प्रिय बहन सुचि, स्नेहाशीष । गजल पर उपस्थित व प्रशंसा के लिए हार्दिक धन्यवाद। 

एकनया शेर जोड़ा है । इसे भी देखिएगा

किसने गिने विवाह में आशीष कितने हैं
भाया हिसाब सबको लिफाफों ने जो कहा।।

Comment by शुचिता अग्रवाल "शुचिसंदीप" on June 4, 2021 at 8:36am

वाहः हर बात डंके की चोट पर यतार्थ को बयां करती हुई।

सभी शेर एक से बढ़कर एक नए हैं भाई लक्ष्मण धामी जी।

कृपया ध्यान दे...

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