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ग़ज़ल (दिलों से ख़राशें हटाने चला हूँ )

122 - 122 - 122 - 122

(भुजंगप्रयात छंद नियम एवं मात्रा भार पर आधारित ग़ज़ल का प्रयास) 

दिलों  में उमीदें  जगाने  चला हूँ 

बुझे दीपकों को जलाने चला हूँ 

कि सारा जहाँ देश होगा हमारा 

हदों के निशाँ मैं मिटाने चला हूँ 

हवा ही मुझे वो  पता  दे गयी है 

जहाँ आशियाना बसाने चला हूँ

चुभा ख़ार सा था निगाहों में तेरी 

तुझी से निगाहें  मिलाने चला हूँ

ख़तावार  हूँ  मैं  सभी दोष  मेरे 

दिलों  से ख़राशें  हटाने चला हूँ

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment by Saurabh Pandey on October 12, 2021 at 5:02pm

आदरणीय अमीरुद्दीन ’अमीर’ साहब, 

भुजंगप्रयात का नशा आप पर ऐसा तारी हुआ दीख रहा है कि आपने तो हमें चकित कर दिया है. यह सात्विक नशा है. इसका बने रहना अवश्य ही सारस्वत विकास का शुभ-कारण हो सकता है.

जय-जय. 

वैसे, इस ग़ज़ल को अरूज के लिहाज से न देखें यह संभव ही नहीं है.  सो, मतले को देखें - 

दिलों  में उमीदें  जगाने  चला हूँ 

बुझे दीपकों को जलाने चला हूँ  

’आने’ के काफिया पर ’जग’ और ’चल’ पूर्ण शब्द निर्धारित हो रहे हैं जो इता के ऐब या दोष का कारण बना रहे हैं.

यह अरूज का दोष होने से मानना तो होगा ही. अगर आपकी तरफ से कोई और ही सूरत बन रही हो तो कृपया साझा करें. 

बाकी, इस बढ़िया कोशिश के लिए दिली बधाइयाँ. 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 10, 2021 at 9:41am

बढ़िया ग़ज़ल कही आदरणीय अमीरुद्दीन जी...

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 9, 2021 at 12:24pm

जनाब लक्ष्मण धामी भाई मुसाफ़िर जी आदाब ग़ज़ल पर आपकी उपस्थिति और उत्साहवर्धन हेतु आभार।  सादर।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on October 9, 2021 at 9:08am

आ. भाई अमीरूद्दीन जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on October 1, 2021 at 7:21pm

जनाब अमन सिन्हा जी आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद सुख़न नवाज़ी और ज़र्रा नवाज़ी का तह-ए-दिल से शुक्रिया। आपकी टिप्पणी दिल छू गई।

ये सच है जनाब सीखना कभी ख़त्म नहीं होता, मैं भी एक तालिब-ए-इल्म हूँ और हमेशा रहूँगा। सादर। 

Comment by AMAN SINHA on October 1, 2021 at 11:28am

जनाब अमिरुद्दिन साहब, 

आप लोगोंं को पढ कर समझ मे आता है की अभी कितना कुछ सिखना मेरे लिये बाकी है और जरूरी भी है।

रचना बहुत अच्छी और दिल को छुने वाली लगी।  

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on September 30, 2021 at 7:17pm

मुहतरम समर कबीर साहिब आदाब, ग़ज़ल पर आपकी आमद मसर्रत-बख़्श है, हौसला अफ़ज़ाई और इस्लाह के लिए मशकूर हूँ। जी सही फ़रमाया मतले में 'लाने' की क़ैद हो रही है, दुरुस्त करने की कोशिश करता हूँ, 'ख़ताएं मिरी थीं ख़तावार हूँ मैं' पर भी कुछ और सोचता हूँ। सादर। 

Comment by Samar kabeer on September 30, 2021 at 3:07pm

जनाब अमीरुद्दीन 'अमीर' जी आदाब, भुजंगप्रयात छंद आधारित ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है, बधाई स्वीकार करें I 

'दिलोंको दिलोंसे मिलाने चला हूँ 

बुझे दीपकों को जलाने चला हूँ'

आपने ग़ज़ल में 'आने' क़वाफ़ी लिये हैं और मतले में 'लाने की क़ैद हप रही है देखिएगा I

'ख़ताएं मिरी थीं ख़तावार हूँ मैं'

इस मिसरे में आपने 'मेरी' शब्द को मात्रा पतन के साथ 'मिरी' लिखा है, छंद में इसकी इजज़त नहीं होती, मिसरा बदलने का प्रयास करें I  

 

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