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ग़ज़ल- भाते हैं कम

212 212 212

1

जाने क्यों इश्क़ के पेच ओ ख़म

ज़ेह्न वालों को भाते हैं कम

2

उनके सर की उठा कर क़सम

हम महब्बत का भरते हैं दम

3

मुस्कुरातीं हैं सब चूड़ियाँ

जब सँवारें वो ज़ुल्फ़ों के ख़म

4

जब जी चाहे बुला लेते हैं

करके पायल की छम-छम सनम

5

होंगे दिन रात मधुमास से

जब भी पहलू में बैठेंगे हम

6

जाएँ जब उनकी आग़ोश में

रौशनी शम्अ की करना कम

7

एक पल में ही मर जाएँगे

देखीं "निर्मल" ने आँखें जो नम

मौलिक व अप्रकाशित

रचना निर्मल

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Comment

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Comment by Rachna Bhatia on January 19, 2022 at 4:58pm

आदरणीय बृजेश कुमार 'ब्रज' जी, ग़ज़ल तक आने तथा सराहना करने के लिए बेहद शुक्रिय:।

Comment by Rachna Bhatia on January 19, 2022 at 4:57pm

आदरणीय अमीरुद्दीन अमीर जी, देर से जवाब देने के लिए क्षमा चाहती हूँ।

ग़ज़ल तक आने तथा सराहना करने के लिए बेहद शुक्रिय:।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 17, 2022 at 11:01pm

अच्छी ग़ज़ल कही है आदरणीया बधाई...

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on January 13, 2022 at 5:38pm

मुहतरमा रचना भाटिया जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है बधाई स्वीकार करें। 

Comment by Rachna Bhatia on January 12, 2022 at 10:42am

आदरणीय मनोज अहसास जी, हौसला बढ़ाने के लिए शुक्रियः।  जी ,बेसब्री से इंतज़ार है। 

Comment by मनोज अहसास on January 12, 2022 at 12:04am

ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है बाकी गुणीजनों की राय की प्रतीक्षा कीजिये

हार्दिक बधाई

सादर

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