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इक कमरे का है ये मकाँ...

यहाँ आदमियों की जगह नहीं,

खाने को दो दिनों की भूख है

पीने को रिस-रिसकर बहता पानी

बेरंग सी दीवारों की मुन्तज़िरी,

औ छत की रोती सी दीवारें

गोशों में बिखरा साजो-सामान

टूटे फर्श के टुकड़े निहारें

इमकान-ए-आसूदगी के पैबंद लगी,

अजीयत की लम्बी चादरें...

कहीं तो जाके ख़तम हों,

ये सोज़-ओ-खलिश की कतारें

अधूरे से पड़े ख्वाब

और न ही चाहतें हैं,

मलबूस-ए-गरीब तो

खामोश ग़मों की आहटें हैं

खुशनुमे कल की उम्मीद है बस...

जीते रहने की और वज़ह नहीं

इक कमरे का है ये मकाँ......




( मुन्तज़िरी= इंतजारी; गोशों= कोनों; इमकान-ए-आसूदगी= ख़ुशी की संभावनाएं; अजीयत= तकलीफ; सोज़-ओ-खलिश= दुःख और उलझन; मलबूस-ए-गरीब= गरीब व्यक्ति का लिबास)

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on September 6, 2010 at 5:42pm
सुन्दर नज़्म|
ब्रह्माण्ड
Comment by Babita Gupta on March 22, 2010 at 3:49pm
Bahut hi khubsurat kriti hai, vivek ji aapney achha likha hai aur bhi kavita likhiyey badhiya likh rahey hai.
Comment by Rash Bihari Ravi on March 15, 2010 at 4:40pm
khubsurat manmohak
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on March 14, 2010 at 11:59am
waah vavek bhai..bahut badhiya dil khush ho gail raur ee rachna padh ke.....etna badhiya lines ke saja ke ek jagah rakh dele bani.....bahut badhiya.....composing kare ke tarika bahut badhiay baa raur....humni ke aasha baa ki aage bhi aisan rachna raur aawat rahi aur humni ke padhe ke milat rahi.........

ek baar fer se kahab waah bhai waah....lagal rahi ehi tarah

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 12, 2010 at 8:46am
खामोश ग़मों की आहटें हैं

खुशनुमे कल की उम्मीद है बस...

जीते रहने की और वज़ह नहीं
Wah wah Vivek bhai kya kamal ki aapki rachna hai, bahut hi khubsurat paktiyo sey saji yey aapki kavita dil ko chhu leney wali hai.
Comment by Admin on March 12, 2010 at 8:34am
खाने को दो दिनों की भूख है

पीने को रिस-रिसकर बहता पानी

विवेक जी आपने बहुत ही खुबसूरत , सच्चाई के नजदीक और दिल को छु जाने वाली कविता लिखा है, बहुत बहुत धन्यवाद .

कृपया ध्यान दे...

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