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ऐसे लोग.. वैसे लोग..
मिरे जैसे नहीं होते अब,
मिरे चेहरे जैसे लोग..
किताबों में ढूढ़ते..
गुजरते वक़्त को,
कब के गुजर गए;
गुजरे वक़्त जैसे लोग..
ये काबा तेरा;
ये शिवाला मेरा,
नींदों में कंधा बाँटते..
ये सरहदों जैसे लोग..
मंदिर की चौखट पे;
होती थी बैठकबाजी,
जाने कब मुसलमाँ बने;
ये मज़हबों जैसे लोग..
अजमत-ए-खुदा थी;
जो रंग-ए-सुर्ख दिया,
कल ज़मीन से निकलते;
नीले-पीले से लोग..
लिखता हूँ नज़्म;
बन जाती है मुअम्मा,
अब कौन सुलझाए;
खुद उलझे से लोग..??
देख रखी है दुनिया;
थोड़ी सी हमने भी,
केवल दो होते हैं;
अच्छे लोग औ बुरे लोग...

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Comment

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Comment by Sanjay Kumar Singh on April 16, 2010 at 8:40am
Bahut badhiya Vivek jee, aapney sahi likha hai Log do hi hotey hai achhey log aur burey log,
Comment by BIJAY PATHAK on April 14, 2010 at 1:41pm
Vivek Mishra ji ,
sarbpratham badhai itna sunder rachna ke liye, padhte hi samajh me aata hai ki ' hriday ne racha rachna hai'
Bijay Pathak
Comment by विवेक मिश्र on April 14, 2010 at 9:16am
हौसला अफज़ाई का शुक्रिया.. ये तो आप लोगों का प्रेम है, जो हम लिख लेते हैं, वरना हम कोई प्रोफेशनल लेखक थोड़े ही हैं. ये कविता मैने ट्रेन में सफ़र करते वक़्त शुरू की थी, और अभी कल परसो जाकर ख़त्म हुई. मेरा मानना है कि लोगों को हिंदू-मुसलमान नही, केवल इंसान मानना चाहिए. हम सब एक हैं और हम सबका मालिक भी एक ही है.

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on April 13, 2010 at 11:55pm
बहुत सही विवेक भाई, आप तो गर्दा उड़ा दिये है, बिल्कुल सोलह आना सही और 24 केरेट सुध बात लिखी है आपने, दुनिया मे बस दो ही प्रकार के लोग होते है अच्छे और बुरे, अगर यह भेद भाव मिट जाता और दुनिया मे केवल अच्छे लोग ही हो जाते तो क्या कहने, ये दुनिया शायद स्वर्ग से सुंदर बन जाता,
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on April 13, 2010 at 1:40pm
bahut badhiay rachna baa vivek jee....
ये काबा तेरा;
ये शिवाला मेरा,
नींदों में कंधा बाँटते..
ये सरहदों जैसे लोग..
मंदिर की चौखट पे;
होती थी बैठकबाजी,
जाने कब मुसलमाँ बने;
ये मज़हबों जैसे लोग..
dhanybaad vivek bhai ehja post kare khatir...............
Comment by amit on April 13, 2010 at 11:43am
ji sahi kaha ji kewal do prakar ke log hote hai achhe aur bure.....
Comment by Admin on April 13, 2010 at 11:26am
ये काबा तेरा;
ये शिवाला मेरा,
नींदों में कंधा बाँटते..
ये सरहदों जैसे लोग..
मंदिर की चौखट पे;
होती थी बैठकबाजी,
जाने कब मुसलमाँ बने;
ये मज़हबों जैसे लोग..
वाह विवेक जी वाह, इस कविता की जीतनी भी तारीफ़ किया जाय वो शायद कम होगी ,फिर आप की एक बेहतरीन रचना हम लोगो के बीच है, आप जो अपने कविता मे उर्दू लफ्जो का पर्योग जिस खूबसूरती से करते है वो तारीफ़ के लायक है,अंत मे जो आप ने कहा की लोग दो ही होते है अच्छे लोग और बुरे लोग, बिलकुल सही कहा है, बहुत बहुत धन्यवाद इस खुबसूरत कविता के लिये, आप के अगला पोस्ट का इंतजार बहुत सिद्दत से रहेगा,

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