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गीत

*

कच्चे रास्तों गडारों से,

गाड़ी निकल रही है।

*

जा रहे हैं किधर कोई,

बूझता ही नहीं।

फूट रहे हैं सर क्योंकर,

सूझता ही नहीं।  

*

अनसुने नारों किनारों से,

गाड़ी निकल रही है।

*

होने लगी सौहार्द की,

मरघटों में सभा।

बची-खुची रिश्तों में की,

खोजते हैं वफ़ा।

*

सूखते टूटे अवारों से,

गाड़ी निकल रही है।

*

स्वप्न जैसे आशियाने,

टूटते घर कई ।

बाहर किताबों से निकल,

भटकते सर कई।   

*

बचते-बचाते इशारों से,

गाड़ी निकल रही है।

#

मौलिक/अप्रकाशित.

 

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Comment

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Comment by Ashok Kumar Raktale on October 12, 2022 at 6:53pm

आदरणीय ब्रजेश कुमार जी सादर, प्रस्तुत गीत रचना पर उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार. सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 4, 2022 at 8:14pm

सरस और नव प्रवाह से सम्मोहित करती हुई रचना ...हार्दिक बधाई आदरणीय

Comment by Ashok Kumar Raktale on September 30, 2022 at 6:33pm

आदरणीय चेतन प्रकाश जी सादर, प्रस्तुत गीत रचना की सराहना केलिए आपका हार्दिक आभार.

वर्तमान दशा में " बची खुची रिश्तों में की" अगली पंक्ति " खोजते हैं वफा " से असम्बद्ध है !...........यहाँ असम्बद्धता जैसा तो प्रतीत नहीं हो रहा है किन्तु 'भी' वाला आपका सुझाव उत्तम है. सादर  

Comment by Chetan Prakash on September 30, 2022 at 10:28am

बंधुवर,  अच्छा गीत  रचा, आपने । दूसरा अन्तरा  बेहतर हो सकता था और  सार्थक  भी । 

बशर्ते  'की' को हटाकर " भी" हो जाए  ! आपने  स्वयं  'गीत ' को नवगीत  कहा  है, अत: अन्तयानुप्रास तो स्वर से ही पर्याप्त  हो जाएगा ! और र, वर्तमान  दशा में " बची खुची  रिश्तों  में की"  अगली  पंक्ति " खोजते  हैं वफा " से असम्बद्ध है ! 

Comment by Ashok Kumar Raktale on September 29, 2022 at 10:02am

आदरणीय समर कबीर साहब सादर नमस्कार, प्रस्तुत गीत रचना पर उत्साहवर्धन हेतु आपका हार्दिक आभार. सादर

Comment by Samar kabeer on September 27, 2022 at 7:23am

जनाब अशोक रक्ताले जी आदाब , भुत अच्चा गीत रचा है आपने , इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें I 

Comment by Ashok Kumar Raktale on September 26, 2022 at 11:24pm

आदरणीय अमीरुद्दीन अमीर साहब सादर, आपका कहना गलत नहीं है. क्योंकि यह एक नवगीत है. नवगीत की रचनाएं अक्सर कविता जैसी ही होती है.सादर

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on September 26, 2022 at 6:44pm

आदरणीय अशोक रक्ताले जी आदाब, मुझे आपकी यह रचना गीत से ज़ियादा हिन्दी की ख़ूबसूरत नज़्म लगी है, बधाई स्वीकार करें। 

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