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सामयिक कुण्डलिनी छंद : रावण लीला देख --संजीव 'सलिल'

सामयिक कुण्डलिनी छंद :
रावण लीला देख
--संजीव 'सलिल'
*
लीला कहीं न राम की, रावण लीला देख.
मनमोहन है कुकर्मी, यह सच करना लेख..
यह सच करना लेख काटेगा इसका पत्ता.
सरक रही है इसके हाथों से अब सत्ता..
कहे 'सलिल' कविराय कफन में ठोंको कीला.
कभी न कोई फिर कर पाये रावण लीला..
*
खरी-खरी बातें करें, करें खरे व्यवहार.
जो कपटी कोंगरेस है,उसको दीजे हार..
उसको दीजै हार सबक बाकी दल लें लें.
सत्ता पाकर जन अधिकारों से मत खेलें..
कुचले जो जनता को वह सरकार है मरी.
'सलिल' नहीं लाचार बात करता है खरी.
*
फिर जन्मा मारीच कुटिल सिब्बल पर थू है.
शूर्पणखा की करनी से फिर आहत भू है..
हाय कंस ने मनमोहन का रूप धरा है.
जनमत का अभिमन्यु व्यूह में फँसा-घिरा है..
कहे 'सलिल' आचार्य ध्वंस कर दे मत रह घिर.
नव स्वतंत्रता की नव कथा आज लिख दे फिर..
*********************

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Comment

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Comment by Shanno Aggarwal on August 23, 2011 at 2:16am
तीनों ही कुंडलिनियाँ बहुत सुंदर. बधाई गुरु जी.
Comment by Gyanchand Marmagya on August 22, 2011 at 5:09pm
wartmaan paripekshya men likhi gayi utkrisht rachana!
Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on August 22, 2011 at 4:06pm
पौराणिक बिम्बों में वर्तमान....
बहुत सुन्दर कुंडलिया हैं सर...
सादर बधाई...




सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 22, 2011 at 1:28pm

त्रेता और द्वापर की संज्ञाओं को बिम्ब का रूप दे आज के परिप्रेक्ष्य में रची गयी तीनों कुण्डलियाँ संदेशात्मकता का निर्वहन करती हैं.

रचयिता के वैचारिक दृष्टिकोण से विलग शिल्प के मद्देनज़र रचनाएँ काव्य-सूत्रों और प्रयुक्त शब्दों को बखूबी उभारती हैं.

सादर.

 

Comment by Rash Bihari Ravi on August 18, 2011 at 3:35pm

फिर जन्मा मारीच कुटिल सिब्बल पर थू है.
शूर्पणखा की करनी से फिर आहत भू है..
हाय कंस ने मनमोहन का रूप धरा है.
जनमत का अभिमन्यु व्यूह में फँसा-घिरा है..
कहे 'सलिल' आचार्य ध्वंस कर दे मत रह घिर.

नव स्वतंत्रता की नव कथा आज लिख दे फिर..
*********************

 

sir satya kha aap ne

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