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कविता - जीव - गणित

कविता -  जीव - गणित
घाट
घाट की सीढियां
सीढ़ियों पर काबिज़ भिक्षुक
हाथ में खनकते बर्तन
हर आने  जाने वाले के लिए
दुआ देती जुबानें
इनकी तस्वीरें
हजारों में बिकती होंगी तुम्हारे देश में
इनकी झुर्रियों में दिखती होंगी तुम्हे
छायांकन की अपार संभावनाएं
पर ये बिलकुल नहीं बिकते हमारे देश में
हाँ ये सच है हमारे देश में बिकती है
हर मजबूर  देह
शौक और लिप्सा के बाज़ार में
इसी लिए अचरज न करना
अगर घाट का भिक्षुक या साधू
तुम्हारे कैमरे को देख हाथ पसार दे
सौ का नोट मांगे
तोल मोल कर दस बीस में मान भी जाए
और ख़ुशी ख़ुशी दे पोज़
अपने दुःख में डूबे चेहरे का
अब तो मानोगे न
कि मुद्रा मुद्रा देख  अक्सर बदल जाया करती है
और बदल जाती है लोगों की मुद्राएँ
तब जब हम बहुत उम्मीद से दस्तक देते हैं उनकी दहलीज़ पर
दहलीज जो  बंधी होती है कुछ समीकरणों  में
और जीव - गणितीय समीकरणों के स्वार्थ  का
कोई देश नहीं होता
कोई सीमा नहीं होती
वे बंधे होते हैं नियमों और उनके सटीक विस्तार में |
 
                  -  अभिनव अरुण   [050911]
 
 
 
 
 

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on September 7, 2011 at 6:47pm
Veerendra Ji bahut shukriya apka !
Comment by Veerendra Jain on September 7, 2011 at 12:15pm

दहलीज जो  बंधी होती है कुछ समीकरणों  में
और जीव - गणितीय समीकरणों के स्वार्थ  का
कोई देश नहीं होता
कोई सीमा नहीं होती
वे बंधे होते हैं नियमों और उनके सटीक विस्तार में |
waah Arun ji..bahut hi badhiya rachna..bahut bahut badhai aapko..
 

Comment by Abhinav Arun on September 7, 2011 at 7:32am
आभार अम्बरीश जी आपकी इस उत्साहवर्धक टिप्पणी ने मेरा हौसला बढाया |
Comment by Er. Ambarish Srivastava on September 7, 2011 at 12:20am

//जीव - गणितीय समीकरणों के स्वार्थ  का

कोई देश नहीं होता

कोई सीमा नहीं होती

वे बंधे होते हैं नियमों और उनके सटीक विस्तार में |//

बहुत खूब भाई अभिनव जी ! आपने इस कविता में सचमुच जान ही डाल दी है ! बहुत-बहुत बधाई !
Comment by Abhinav Arun on September 6, 2011 at 3:44pm

guru ji aapka aashirwaad mila ham dhanya hue !! haardik abhaar sneh banaye rakhen !!

Comment by Rash Bihari Ravi on September 6, 2011 at 3:27pm

bahut khubsurat kavita sir ji

Comment by Abhinav Arun on September 6, 2011 at 3:08pm

many many thanks RESPECTED DUSHYANT JI AND SHRI ASHISH JI . its good to read your couragious comments .

Comment by दुष्यंत सेवक on September 6, 2011 at 2:50pm

अब तो मानोगे नकि मुद्रा मुद्रा देख  अक्सर बदल जाया करती है और बदल जाती है लोगों की मुद्राएँ

आहा! अरुण जी काव्य की सुंदरता परिलक्षित करती बेहद सुंदर पंक्तियाँ...पढ़ते पढ़ते मैने भी कई मुद्राएँ बदली....आभार स्वीकारे

Comment by आशीष यादव on September 6, 2011 at 2:39pm

बहुत सुन्दर कविता की रचना हुई है| बिलकुल यथार्थ चित्रण किया गया है|
एक दो जगह अनायास ही अलंकार आकर इस कविता की शोभा में चार चाँद लगा रहे है ये काव्य का चमत्कार ही है|
जैसे
मुद्रा मुद्रा देख  अक्सर बदल जाया करती है

Comment by Abhinav Arun on September 6, 2011 at 2:04pm

रचना पसंद करने के लिए आदरणीया मोहिनी जी का भी बहुत बहुत आभार !!

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