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सरकारी नौकरी ( लघुकथा )

'' घर नहीं चलना , टाइम हो चुका है .'' - मेरे साथी ने मुझसे कहा . मैंने इस कार्यालय में आज ही ज्वाइन किया था .शायद इसीलिए उसने मुझे याद दिलाना चाहा था .
'' मेरी घड़ी पर तो अभी दस मिनट बाकी हैं .'' - मैंने घड़ी दिखाते हुए कहा .
'' वो तो मेरी घड़ी पर भी हैं ."
'' फिर ? ''
'' हम तो ऑफिस की घड़ी के हिसाब से चलेंगे .'' - उसने ऑफिस की घडी की तरफ इशारा किया .
'' लेकिन आए तो हम अपनी घडी के मुताबिक थे .''
'' हाँ , यही तो सरकारी नौकरी है .'' - उसने हंसते हुए कहा और ' देर से आना जल्दी जाना ' गुनगुनाते हुए वह बाहर की तरफ लपका , मैं भी अपना सामान समेटने लगा .

                 * * * * *
                            -----------  दिलबाग विर्क 

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on February 22, 2012 at 12:22pm

बहुत सुन्दर लघुकथा - बधाई आदरणीय दिलबाग जी.


Comment by dilbag virk on February 17, 2012 at 8:10pm

सभी सुधीजनों का बहुत-बहुत आभार


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 17, 2012 at 3:30pm

बड़े ही हौले से चोट लगाया है, खुबसूरत और संदेशपरक लघुकथा हेतु बधाई दिलबाग जी ।

Comment by आशीष यादव on February 17, 2012 at 8:32am
बिल्कुल सही। हालात को दिखाती यह लघुकथा। बधाई

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on February 17, 2012 at 8:28am

यही तो हो रहा है आजकल सरकारी नोकरी मे प्राइवेट मे देरी कर के दिखाओ ...लघु कथा मे अच्छा व्यंग दिखाई दिया 

Comment by Nazeel on February 17, 2012 at 7:37am
Nice

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 16, 2012 at 9:43pm

यही कारण हैं, सरकारी नौकरियों का साहबी होना.

चटख तथ्य को उजागर करता कथ्य.

बहुत-बहुत बधाई दिलबाग़जी.

Comment by Pradeep Bahuguna Darpan on February 16, 2012 at 9:38pm
Bahut khoob ....
Achchhi Rachna ....
Comment by jaswant gharu on February 16, 2012 at 8:55pm
very good dilbag ji ofice me ese hota h

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