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मैंने जीना चाहा था

सुर्ख इबारत बयाँ करेगी – मैंने जीना चाहा था,
चाक कलेजे के ज़ख्मों को मैंने सीना चाहा था;
जो भी आया उसने ही कुछ दुखते छाले फोड़ दिए,
वहशत की आग बुझाने को मेरे सब सपने तोड़ दिए;
तेरे आँचल के धागों से रिसना ढकना चाहा था,
सुर्ख इबारत बयाँ करेगी- मैंने जीना चाहा था |

अपनी ही रुसवाई पर, हम तो हँसते रहे सदा,
गम को गले लगा के रोये, खुशियाँ करते रहे विदा;
गम बाजारू हों ना जाएँ, आँसू पीना चाहा था,
सुर्ख इबारत बयाँ करेगी – मैंने जीना चाहा था |

तुझको देखा, तुझको चाहा, मैंने तुझको जाना था,
दो पल जी लूँ तेरा बनकर, और तो ना कुछ पाना था;
कुछ सूखे ज़ख्मों का मैंने दर्द भुलाना चाहा था,
सुर्ख इबारत बयाँ करेगी – मैंने जीना चाहा था |

तेरे होठों की जुम्बिश को मैंने माथे पर रखा,
तेरी कही-अनकही बातों को पल-पल पहचाना था;
मैं ना तुझसे दगा करूँगा, यकीं दिलाना चाहा था,
सुर्ख इबारत बयाँ करेगी – मैंने जीना चाहा था |

बस तेरे इक पल की खातिर मैंने दर्द हज़ार जिए,
प्यास बुझाने की खातिर अपने आँसू दिन रात पिए;
ना कोई दरकार और थी, ना कुछ लेना चाहा था,
सुर्ख इबारत बयान करेगी – मैंने जीना चाहा था |

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on March 13, 2012 at 1:19pm

//सुर्ख इबारत बयाँ करेगी- मैंने जीना चाहा था |//

वाह वाह वाह बहुत खूब. ये "सुर्ख इबादत" बहुत कुछ बयाँ कर गई, मेरी बधाई स्वीकारें.

Comment by Chaatak on March 13, 2012 at 8:41am

Thanks Neeraj ji, I do think so :)

Comment by Chaatak on March 12, 2012 at 10:12pm

राजेश कुमारी जी, सादर अभिवादन, पंक्तियों पर आपकी अच्छी प्रतिक्रिया पाकर बेहद खुशी हुई| हार्दिक धन्यवाद!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 12, 2012 at 10:06pm

बहुत अच्छे भाव सुन्दर शब्द संयोजन बहुत अच्छी लगी आपकी रचना 

Comment by Chaatak on March 12, 2012 at 9:44pm

स्नेही मयंक जी, सादर अभिवादन, आपके मार्गदर्शन से ही इस मंच तक पहुँच पाया हूँ| आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

Comment by Chaatak on March 12, 2012 at 9:42pm

स्नेही आशीष जी, सादर अभिवादन, उत्साहवर्धन करने का हार्दिक धन्यवाद !

Comment by Chaatak on March 12, 2012 at 9:41pm

स्नेही आनंद जी, सादर अभिवादन, रचना पर आपकी उत्साहवर्धक टिप्पडी से बेहद खुशी हुई|
हार्दिक धन्यवाद !

Comment by Chaatak on March 12, 2012 at 9:39pm

स्नेही वाहिद जी, पंक्तियों पर आपके विचार जानकर बहुत खुशी हुई| आप बंधुओं का प्रेम ही सबसे बड़ा मार्गदर्शक है|
हार्दिक धन्यवाद!

Comment by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on March 12, 2012 at 7:34pm

सुर्ख इबारत बयां करेगी-सब तेरे दिल की बातें|

कितना खोया,कितना पाया,कितनी घातें,प्रतिघातें?

इस जीवन में एक ही सच है,दुनिया आनी जानी  हैं|

जीवन उसका ही जीवन है जिसकी यादे आती हैं|..बहुत ही सुन्दर काव्य रचना चातक भाई|

Comment by आशीष यादव on March 12, 2012 at 7:30pm
एक सुन्दर रचना। पढ़ते हुए बहुत अच्छा लगा। सुन्दर भाव। बधाई स्वीकारेँ।

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