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कविता : - स्नेह अटल है !

कविता : - स्नेह अटल है !
 

झर झर झरता झीना झीना

जीवन जल है .

फाहा फाहा फहरें फर फर 

साँसें छल है .

मह मह मतिभ्रम में मानव मन

विकट विकल है .

नूपुर नवल नवनील नीरवता

आशा कल है .

उन्मत्त ऊर्जा उर उर्ध्वाधर

रक्त प्रबल है .

क्षमा क्षरण क्षय क्षितिज क्षुब्धवत

कैसा हल है .

अदम आदमी आदम अदभुत

स्नेह अटल है  .

सृजन सुफल सृष्टि संश्लेषित

श्रेष्ठ सरल है .

पुष्प पलाश प्रेममय पाश

तलहटी  तल है .

विदा विलोम विपुल विभ्रम वश

शाश्वत फल है .

 

                   - अभिनव अरुण

                      (13032012)

 

 

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Comment

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Comment by विवेक मिश्र on March 17, 2012 at 9:50am

शुरूआती चार पंक्तियों में ही जीवन का फलसफा दिख गया. सुन्दर और प्रवाहमयी प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई अरुण जी.
जय हो!

Comment by Abhinav Arun on March 16, 2012 at 9:07pm

हार्दिक आभार अतेन्द्र जी काफी दिनों के बाद आपका आगमन सुखद है !!

Comment by Atendra Kumar Singh "Ravi" on March 16, 2012 at 5:00pm

अनुप्रास अलंकार से सुसज्जित भावपूर्ण कविता के लिए हार्दिक बधाई है सर जी ...........अतेंद्र कुमार सिंह'रवि'

Comment by Abhinav Arun on March 14, 2012 at 1:30pm

आदरणीय श्री सौरभ जी , शशि प्रकाश जी , राकेश जी ,आदरणीया डॉ प्राची जी , राजेश कुमारी जी , महिमा श्री जी हार्दिक हार्दिक रूप से धन्यवाद रचना की सराहना के लिए !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 13, 2012 at 7:32pm

आनुप्रासिक रचना ! वाह !! प्रवाहमयी कविता की भाव दशा मुग्ध कर गयी. इस विशिष्ट रचना के लिये हृदय से बधाई स्वीकारें.

Comment by shashiprakash saini on March 13, 2012 at 7:00pm

अरुण जी बहोत ही बेहतरीन कविता है बधाई स्वीकारे 

Comment by राकेश त्रिपाठी 'बस्तीवी' on March 13, 2012 at 3:50pm

माननीय अभिनव जी, वाह वाह!! अति उत्तम. शब्दो का अद्भुत प्रयोग. बहुत बहुत बधाइयाँ. कविता नही मानो पानी बह रहा हो दूर कहीं पहाड़ पे और उसकी निनाद कागज पर उतार दी गये. बहुत खूब.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 13, 2012 at 2:33pm

वाह अरुण जी सुन्दर प्रवाह श्रेष्ठ अनुप्रास अलंकार का संयोजन कविता की ख़ूबसूरती में चार चाँद लगा रहे हैं  बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति है यह आपकी बधाई स्वीकारें 

Comment by MAHIMA SHREE on March 13, 2012 at 2:12pm
झर झर झरता झीना झीना
जीवन जल है .
फाहा फाहा फहरें फर फर
साँसें छल है .
मह मह मतिभ्रम में मानव मन

आदरणीय अरुण जी
नमस्कार ..झरने की तरह अविरल बहती हुई ...अतिसुंदर ...अभिव्यक्ति.....बिलकुल "अभिनव".....
बहुत -२ बधाई आपको...
Comment by Abhinav Arun on March 13, 2012 at 1:55pm
Shri Sandeep Wahid ji apke in sneh purn shabdon se ahladit hoon.bahut shukriya apka !

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