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भावनाओं का दमन,  

संवेदनाओं का संकुचन देख रहे हैं 

आदान-प्रदान सब गौण  हुए  

अब ऐसा चलन देख रहे हैं |

स्वार्थ के बढ़ते  दाएरे, 

जन- जन  को छलते देख रहे हैं 

हिंद  का वैभव स्विस बेंकों में 

 हक को जलते देख रहे हैं |

भ्रष्टाचारी को जीवंत, 

संत ज्ञानी को मरते देख रहे हैं 

अगन उगलते सूरज में, 

नम धरा झुलसते देख रहे हैं | 

दूध की नदियाँ उनके प्रांगण, 

ये सूखी प्याली देख रहे हैं 

कनक की रोटी उनके घर में 

ये खाली थाली देख रहे हैं |

देख के विघटित स्वर्ण चिरैया, 

शत्रु जाल फेंकते देख रहे हैं 

भावी देश की सूरत को हम 

नभ दर्पण में  देख रहे हैं |

        *****     


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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 29, 2012 at 7:57am

Ashok kumar ji haardik dhanyavaad.

Comment by Ashok Kumar Raktale on March 28, 2012 at 11:47pm

यथार्थ पर सुन्दर रचना. बधाई.
 सबसे बड़े गणतंत्र में भ्रष्टतंत्र अब देख रहे हैं,
 देश की बदहाली का हाल खड़े हम देख रहे हैं.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 27, 2012 at 10:01pm

bahut bahut hardik aabhar Ganesh ji.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 27, 2012 at 8:53pm

क्या कहने ,आदरणीया राजेश कुमारी जी, गागर में सागर भरने का प्रयास आपने किया है, बहुत ही सुन्दर ख्याल, बधाई आपको |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 27, 2012 at 4:43pm

shukria chaatak  ji.

Comment by Chaatak on March 27, 2012 at 4:11pm

खूबसूरत उदगार! हार्दिक बधाई!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 27, 2012 at 8:24am

bahut bahut aabhar Neeraj ji.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 26, 2012 at 9:37pm

Ravindra Nath ji is sundar vishleshan ke liye hardik aabhar. 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 26, 2012 at 9:36pm

Pradeep Kumar ji bahut aabhari hoon.

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 26, 2012 at 9:06pm

aadarniya mahodaya ji, sadar abhivadan , vastvikta darshati rachna . badhai.

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