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आत्म-विश्वास से सरोबर   आत्मविश्वास से लबालब सरोबार,  आशा है पौ फटते ही- सुबह जरूर आएँगी, भंवरों क़ी गुन -गुन, कोयलक़ी कुहू-कुहू, बारिश की रिम-झिम-  कानो में गूंजेगी,गौरव पताका फहरेंगी | बासन्ती मधुम…

आत्म-विश्वास से सरोबर  

आत्मविश्वास से लबालब सरोबार, 

आशा है पौ फटते ही- सुबह जरूर आएँगी,

भंवरों क़ी गुन -गुन, कोयलक़ी कुहू-कुहू,

बारिश की रिम-झिम- 

कानो में गूंजेगी,गौरव पताका फहरेंगी |

बासन्ती मधुमास का- सुहावना आभास होगा, 

तभी तो रसिक मन सखियाँ- 

कृष्ण मन में मोहित हो, 

पेंजनियाँ बजा- पांवो को थिर्कायेंगी, 

मन्त्र-मुग्ध हो करेगी-

कृष्ण को समर्पित |  

हाँ, पौ फटते ही वह प्रातः बेला - 

फिर जरूर ही आएँगी, नवीन कोंपलों पर 

औंस की बूंदों का मोती सा- 

खुशनुमा अहसास कराएंगी |

आत्मविश्वास बढ़ाएंगी, 

गौरव पताका फहरायेंगी,

झरोखे से रौशनी लायेंगी,

अंध-विश्वास के बादल हटाएँगी,  

- लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला,जयपुर 


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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 5, 2012 at 11:20am

सुंदर कविता के लिए बधाई स्वीकार करें आद. लडीवाला जी.

Comment by दुष्यंत सेवक on May 3, 2012 at 4:41pm

सुन्दर रचना है लक्ष्मण जी.. टंकण त्रुटियों पर एक बार नज़र मार लें .. सराबोर ... सही शब्द होगा.. 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 2, 2012 at 12:58pm

nishchit hi andh vishvaas ka badal hatayengi. badhai sundar asha purn rachna hetu, aadarniya mahodaya ji. 

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