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एक  नयी  दुनिया 

एक  नयी  दुनिया देखी  है अन्तः  मन  की  आँखों  से

 

जिसमे  कोई  रंग  नहीं  हैं , पर  सारे  रंगों  से  सुन्दर ..

जिसमे  कोई  कशिश  नहीं  है , है  वो  जैसे  शांत  समुन्दर ..

मै उस  दुनिया  मे  बसती  हूँ , है  वो  समाई  मेरे  भीतर .

उसका  कोई  अंत  नहीं  है , है  वो  एक  अनंत  सा  अम्बर ..

 

  है वो  सूरज  से  रोशन ,   है  रात  वहां  अंधेरी ..

एक  उजाले  सी  उज्वल  है , हर  पल  जैसे  सुबह  सवेरी..

ना  है  कोई  नीर  की  बदली , ना  है  कोई  पंछी-परिंदा ..

दूर  दूर  तक  ना  ही  दिखती , कोई  परछाई , कोई  बाशिंदा ..

 

एक  रेत जैसा  मरुधर  है , है  जिस  पर  शीतल  सी  छाया ..

  कोई  जीव    पौधा  कोई , जीवन  सारा  मुझ  मे  ही  समाया ..

  मौसम  आते  जाते  हैं ,   ही  सर्द -गर्म  राते  हैं ..

हर  लम्हा  मदहोशी  सी  है , एक  सुन्दर  ख़ामोशी सी  है ..

 

  है  हवा  का  झोंका  कोई , पर  हर  पल  सहलाती  ठंडक ..

  है  जलधर  झरना  कोई , पर    कोई  प्यास  वहां पर ..

  कोई  आवाज़ - ना  आहट ,   कोई  जज़्बात  – ना  चाहत ..

हर  पल  खुद  से  साथ  है  खुद  का , हर  पल  है  वो  साथ वहां  पर ..

 

ऐसी  ही  दुनिया  देखी  है , अन्तः  मन  की  आखों  से

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Comment by MAHIMA SHREE on May 7, 2012 at 1:25pm
आदरणीय प्राची जी ,
खुबसूरत नयी दुनिया में ले जाने के लिए आपको हार्दिक बधाई

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 6, 2012 at 9:38pm

Heartfelt thanks,

ASHISH YADAV JI, for catiching it in an instant that this poetry is not any imagination, but a result of flashed vision from the meditaive depths.

 

Resp.Rajesh Kumari Ji for appreciating my effort of rhyming writting

 

RESP. Jawahar Lal Ji and Resp . Pradeep Kushwaha Ji for appreciating the expression.

 

 

 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 6, 2012 at 9:13pm

koi kasht nahi, sundar dunia. nayi dunia vah nikalti hai. badhai.

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 6, 2012 at 9:02pm

डॉ. प्राची जी, बहुत सुन्दर! बहुत सुन्दर! बहुत सुन्दर! बहुत सुन्दर! बहुत सुन्दर!
ऐसा ही अगर हम सब देखने लगें तो फिर किस बात का रोना!
रोशन हो जाय यह जिन्दगी का आंगन बाकी न रहे कोई कोना!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 6, 2012 at 7:47pm

बहुत सुन्दर रचना प्राची लय बध का प्रयास अच्छा किया है बधाई 

Comment by आशीष यादव on May 6, 2012 at 6:07pm
निर्गुण है पर सारे गुण हैँ। बेहतरीन रचना। ये तिसरी आँख का कमाल है जब कुछ न होते हुए भी सबकुछ दिखता है।
बधाई स्वीकारेँ

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