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गुफ्तगू माँ से (मदर्स डे पर )

माँ 
ये कौन सी  सफलता है 
ये कैसा लक्ष्य है
जो ले आया है
तुमसे दूर 
बहुत दूर
ये कैसी तलाश है
कैसा सफ़र है
की मैं चल पड़ी हूँ 
अकेले ही
तुम्हे छोड़ कर
ये कैसी जिद है मेरी
ठुकरा कर छत्र छाया तेरी
निकल पड़ी हूँ
कड़ी धूप में झुलसने को
पर जानती हूँ
तेरी दुआएं है  साथ मेरे
जो चलती है संग 
मेरा साया बनकर 
और तपिश को
शीतल कर देती है
ठंडी बयार बन कर
आती है याद मुझे तू
हर दिन
हर रात
फिर से तेरे आँचल में छुपने का
दिल करता है
फिर से तेरे हाथो की  
बनी रोटियां खाने को
जी करता है
पर तुमने ही कहा था न माँ
चिड़िया  के बच्चे
जब उड़ना सीख जाते हैं
तो  घोसलों को छोड़
लेते हैं ऊँची उड़ान   
और दूर निकल जाते है
मैं भी तो
निकल आई हूँ
बहुत दूर
लौटना अब मुमकिन नहीं
क्योंकि
राहें कभी मुडती नहीं
और प्रवाह नदी का
उलटी दिशा में
कभी बहता नहीं

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Comment by Sonam Saini on July 3, 2012 at 1:16pm

आती है याद मुझे तू

हर दिन
हर रात
फिर से तेरे आँचल में छुपने का
दिल करता है
फिर से तेरे हाथो की  
बनी रोटियां खाने को
जी करता है
पर तुमने ही कहा था न माँ
चिड़िया  के बच्चे
जब उड़ना सीख जाते हैं
तो  घोसलों को छोड़
लेते हैं ऊँची उड़ान   
और दूर निकल जाते है
मैं भी तो
निकल आई हूँ
बहुत दूर
लौटना अब मुमकिन नहीं
क्योंकि
राहें कभी मुडती नहीं
और प्रवाह नदी का
उलटी दिशा में
कभी बहता नहीं  .................shabd nahi h tarif ke liye..................God bless u
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 20, 2012 at 4:25am

धन्यवाद महिमा बहन भाव समझाने के लिए!

Comment by MAHIMA SHREE on May 19, 2012 at 8:59pm

आदरणीय जवाहर सर , आपका कहना सही है .. पर जिद में या कहे जब खुली हवा में  निकलते है तो सोचते है हर बंधन से आजाद होगये और      हम अक्सर ऐसा कहते है ना .... बस यही कहना चाहा

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on May 19, 2012 at 8:47pm
चिड़िया  के बच्चे
जब उड़ना सीख जाते हैं
तो  घोसलों को छोड़
लेते हैं ऊँची उड़ान   
और दूर निकल जाते है
पर शाम को अपने घोसले में मन के पास लौट के आ जाना चाहिए न!
माँ का प्यार क्या  नदी का प्रवाह है जो उल्टी दिशा में नहीं मुड़ेगा ... थोड़ा असमंजस में हूँ या भाव ठीक से नहीं समझ पाया.
अगर नहीं समझा तो समझाने का कष्ट करेंगी, महिमा बहन! 
 
Comment by Rekha Joshi on May 16, 2012 at 9:25pm

क्योंकि

राहें कभी मुडती नहीं
और प्रवाह नदी का
उलटी दिशा में
कभी बहता नहींbahut khub,badhaai
Comment by MAHIMA SHREE on May 16, 2012 at 8:40pm
आदरणीय डॉ सूरज जी , नमस्कार  
स्वागत है आपका , हसला अफजाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया /
Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on May 16, 2012 at 3:18pm

महिमा जी माँ की ममता और जीवन की सच्चाई से रूबरू करती इस उच्च कोटी की खूबसूरत रचना के लिए आपको बहुत बहुत बधाई !!

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 15, 2012 at 10:59pm

माँ को कभी कोई ठुकरा सकता है भला ...वो कोई मूढ़ ही होगा..बिलकुल ठीक कहा आप ने महिमा जी ...जय श्री राधे 

भ्रमर५ 
Comment by MAHIMA SHREE on May 14, 2012 at 3:51pm
आदरणीय भ्रमर सर , नमस्कार .. बिलकुल सहमत हूँ .. माँ को कभी कोई ठुकरा सकता है भला ...वो कोई मूढ़ ही होगा
Comment by MAHIMA SHREE on May 14, 2012 at 3:48pm
आदरणीय अजय जी .. सादर आभार

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