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कविता - बहती सी गंगा

 कविता - बहती सी गंगा  
 
 
हमने एक नदी को बाँधा
और अब करते हैं
रेत की पुजैय्या
किनारे रुकी नाव की लाश पर !
 
हमने एक बहती नदी को नाला बनाया
उसमें शहर भर के अपशिष्ट डाले
और अब हर शाम अँधेरे में उस काले नाले की आरती उतार
विदेशी अतिथियों की राह तकते है !
 
हमने किताबों में नदी की महत्ता बताई
रामायण और महाभारत से गंगा के किस्से बच्चों को सुनाये
और अब उन बच्चों को
स्वीमिंग पूल में तैरना सिखा कर
ओलम्पिक गोल्ड मेडल पाने की हसरत संजो रहे हैं
सच मुच हम अपनी इच्छाएं विकास के गाल में डुबो रहे हैं !
 
हम दूर देश से टूर पर आये साइबेरिआइ पक्षी
इस   बार पहले सी गंगा को न पाकर दुखी हैं
मगर  ये  प्रण  है अगली  बार हम ओल्गा  से भर भर चोंच  लायेंगे  जल
और भर देंगे  पहले सी पावन  पवित्र   बहती सी गंगा   !!
 
                              - अभिनव  अरुण  
                                  [15052012]
 

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Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on July 3, 2012 at 11:00pm

हम दूर देश से टूर पर आये साइबेरिआइ पक्षी

इस   बार पहले सी गंगा को न पाकर दुखी हैं
मगर  ये  प्रण  है अगली  बार हम ओल्गा  से भर भर चोंच  लायेंगे  जल
और भर देंगे  पहले सी पावन  पवित्र   बहती सी गंगा   !!
अभिनव भ्राता जी बहुत सुन्दर सन्देश  ..सच है सब कुछ बदल डालने वाले और कोई नहीं हम ही हैं ..काश सब मिल सकारात्मक सोच बनायें सब पावन और पवित्र हो जाए प्रेम से मन कंवल खिल जाए ..बधाई ....आभार 
  ..भ्रमर ५ 
Comment by Abhinav Arun on May 29, 2012 at 11:12am
बहुत बहुत आभार आदरणीय श्री उमाशंकर जी !!आपने सही कहा अब अपने संसाधनों के लिए हमें अधिक सतर्क रहना है !! 
Comment by UMASHANKER MISHRA on May 28, 2012 at 12:31am

बहु सुन्दर तरीके से पर्यावरण संरक्षण कि बात कही गई

साथ हि उन लोगों के लिए सीख है जो केवल आय का जरिया समझ कर

गंगा का इस्तेमाल करते है

Comment by Abhinav Arun on May 25, 2012 at 7:43pm

परम श्रद्धेय  श्री बागी जी !! आपके उत्साहवर्धन का आभार !! इधर निजी कारणों से समय थोडा कम दे पा रहा  हूँ , इसका खेद है | पर समय मिलते ही रचनाओं को पढ़ लेता हूँ और यथा संभव विचार bhi देने का प्रयास करता हूँ |


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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 23, 2012 at 8:02pm

आदरणीय अरुण जी, कविता और ज्ञान साथ साथ बाटने के लिया आपको कोटिश: धन्यवाद, बहुत ही प्यारी रचना जिसमे अपने धरोहरों के प्रति आपकी चिंता भी दिखती है, बधाई स्वीकार करें |

Comment by Abhinav Arun on May 21, 2012 at 12:07pm
हार्दिक आभार श्री योगी जी अभिव्यक्ति के अनुमोदन के लिए !! 
Comment by Yogi Saraswat on May 19, 2012 at 4:10pm
हम दूर देश से टूर पर आये साइबेरिआइ पक्षी
इस   बार पहले सी गंगा को न पाकर दुखी हैं
मगर  ये  प्रण  है अगली  बार हम ओल्गा  से भर भर चोंच  लायेंगे  जल
और भर देंगे  पहले सी पावन  पवित्र   बहती सी गंगा   !!
सही कहते हैं आप ! अब गंगा को वोल्गा से ही पानी मागना पड़ेगा !
Comment by Abhinav Arun on May 19, 2012 at 7:12am
आदरणीय श्री अशोक    जी  हार्दिक रूप से आभार | सही कहा आपने अब samay आ गया है की अपनी राष्ट्रीय धरोहर को उसका मूल स्वरुप वापस दिलाने के गंभीर यत्न हों !
 
Comment by Ashok Kumar Raktale on May 18, 2012 at 7:24pm

अरुण जी
        सादर, कर्णधारों को छोड़ सभी चिंतित हैं गंगा की प्रदूषित स्वरुप पर. फिरभी मन का उत्साह कम नहीं हो रहा. उम्दा रचना. बधाई.

Comment by Abhinav Arun on May 18, 2012 at 4:12pm

स्वीकारोक्ति - इस कविता को लिखते समय एक प्रवाह में जो बिम्ब मानस में बने वह शब्दों में व्यक्त हैं \ इसमें "वोल्गा" का "ओल्गा" भूल से हो गया है | इसमें सतर्कता बरती जानी चाहिए थी इससे इनकार नहीं | ध्यान दिलाने के लिए हार्दिक आभार | हाँ बनारस में इन परिंदों के रूस से आने की बात प्रचलित है संभव है वह भी मिथ्या परंपरा सदृश हो \

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