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              चल वहीँ पे नीड़ बनायें हम 

जहां सुन्दर परियां रहती हों 

जहां निर्मल नदियाँ बहती हों 

जहां दिलों कि खिड़की खुली-खुली 

जहां सुगंध पवन में घुली- घुली  

जहां खुशियाँ  हंसती हो हरदम 

                      चल वहीँ पे नीड़ बनायें हम 

जहां दरख़्त खड़े हों बड़े-बड़े 

हर शाख पे झूले पड़े -पड़े 

जहां संस्कृतियों का वास हो 

जहां कुटिलता का ह्रास हो 

कोई ऐसा तरु उगाये हम 

                       चल वहीँ पे नीड़ बनायें हम 

जहां भ्रष्टाचार का नाम ना हो 

जहां बेईमानी का काम ना हो 

जहां तन- मन के कपडे उजलें हों 

जहां स्वस्थ अशआर की ग़ज़लें हों

कोई निर्धन हों ना कोई गम 

                        चल वहीँ पे नीड़ बनायें हम 

जहां भाईचारे की  खाद डले

जहां माटी से सोना निकले 

जहां श्रम का फल दिखाई दे 

जहां कर्म संगीत सुनाई दे 

आ ऐसी फसल उगाये हम 

                          चल वहीँ पे नीड़ बनायें हम 

जहां अपराधो का डंक ना हों 

जहां राजा हों कोई रंक ना हों  

जहां पुष्प  खिले कांटें ना खिले 

जहां मीत मिले दुश्मन ना मिले 

ऐसा गुलशन महकाएं  हम 

                            चल वहीँ पे नीड़ बनायें हम 

              **********

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 17, 2012 at 7:11pm

प्रदीप कुमार कुशवाह जी बहुत -बहुत हार्दिक आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 17, 2012 at 7:10pm

सौरभ जी आपकी टिपण्णी सर आँखों पर मेरी कविता को सराहा बहुत बहुत आभार 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on May 17, 2012 at 6:41pm

aao milke banayen aesa jahan

tha kabhi bharat desh mahan 

loota inko gaddaron ne

ab har kadam pe jindagi ka imtihan.

badhai, aadarniya rajesh kumari ji. saadar 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 17, 2012 at 5:57pm

आपकी कोमल सी आशा को दम मिले और आपका नीड़ बन कर खड़ा हो. आपकी इस कविता के नेपथ्य से अमर-गीत ’आ चल के तुझे मैं लेके चलूँ..’ बरबस याद आता रहा.  बधाई और शुभेच्छाएँ.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 17, 2012 at 10:37am

योगी सारस्वत जी हार्दिक आभारी हूँ आपके प्यारे से कमेन्ट के लिए 

Comment by Yogi Saraswat on May 17, 2012 at 10:29am

जहां भ्रष्टाचार का नाम ना हो 

जहां बेईमानी का काम ना हो 

जहां तन- मन के कपडे उजलें हों 

जहां स्वस्थ अशआर की ग़ज़लें हों

कोई निर्धन हों ना कोई गम 

                        चल वहीँ पे नीड़ बनायें हम

बहुत  खूबसूरत कल्पना  आदरणीय राजेश कुमारी जी ! हर मन की यही तो आवाज़ होती है , दूर गगन की छांव में , एक प्यारा सा घर हो अपना ! बहुत सुन्दर भाव


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 16, 2012 at 9:48pm

रेखा जी आपकी प्रोत्साहन  पूर्ण टिपण्णी के लिए हार्दिक आभार 

Comment by Rekha Joshi on May 16, 2012 at 9:44pm


जहां राजा हों कोई रंक ना हों  

जहां पुष्प  खिले कांटें ना खिले 

जहां मीत मिले दुश्मन ना मिले 

ऐसा गुलशन महकाएं  हम bahut badhiya ,badhaai svikaar kare


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 16, 2012 at 9:40pm

महिमा जी हार्दिक आभार आपका 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on May 16, 2012 at 9:30pm

शायर राज बाजपाई जी मंत्र मुग्ध तो आपकी टिपण्णी ने कर दिया एक लेखक को और क्या चाहिए 

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