तुझको साया कहता हूँ , खुद भी तेरे जैसा हूँ
सागर हूँ गहरा लेकिन, लहरें कहती तन्हा हूँ
मुझसे क्यूँ शरमाते हो, मैं तो बस आईना हूँ
कहलो गंदा जितना तुम, मैं बस अच्छा सुनता हूँ
आँखों से पीकर के भी, तिश्ना है मैं प्यासा हूँ
तू फूलों की क्यारी है, मैं काँटों का रस्ता हूँ
तुमको पाया तब जाना, इंसां हूँ औ जिन्दा हूँ
तुमसे "दीप" ये रोशन है, तुम बिन मैं खुद अँधा हूँ
संदीप पटेल "दीप "
Comment
sandeep ji ,
आँखों से पीकर के भी, तिश्ना है मैं प्यासा हूँ
तू फूलों की क्यारी है, मैं काँटों का रस्ता हूँ ,bahut khub ,badhai
बहुत खूब !
आदरणीय संदीप जी, सादर
जीवन का अहसास जरूरी है , बधाई
तुमको पाया तब जाना, इंसां हूँ औ जिन्दा हूँ
तुमसे "दीप" ये रोशन है, तुम बिन मैं खुद अँधा हूँ
बढ़िया लेखन श्री संदीप पटेल जी , बधाई एक अच्छी रचना के लिए
waah waah !
bahut khoob kaha ji.........
Sandeep Patel DEEP ji...badhaai !
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