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मुक्तिका: मुस्कुराते रहो... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:
मुस्कुराते रहो...
संजीव 'सलिल'
*
मुस्कुराते रहो, खिलखिलाते रहो
स्वर्ग नित इस धरा पर बसाते रहो..
*
गैर कोई नहीं, है अपरिचित अगर
बाँह फैला गले से लगाते रहो..  
*
बाग़ से बागियों से न दूरी रहे.
फूल बलिदान के नव खिलाते रहो..
*
भूल करते सभी, भूलकर भूल को
ख्वाब नयनों में अपने सजाते रहो..
*
नफरतें दूर कर प्यार के, इश्क के
गीत, गज़लें 'सलिल' गुनगुनाते रहो..
***

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प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on June 6, 2012 at 11:54am

//गैर कोई नहीं, है अपरिचित अगर
बाँह फैला गले से लगाते रहो..  //

वाह वाह वाह अति  सुन्दर विचार, अति सुन्दर मुक्तिका, बधाई स्वीकार करें आचार्यवर.

Comment by sanjiv verma 'salil' on June 6, 2012 at 8:56am

सौरभ जी,  उमाशंकर जी,  राजेश कुमारी जी,  रेखा जोशी जी,  प्रदीप जी, सूरज जी, अलबेला जी
आपकी गुणग्राहकता को नमन. 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on June 5, 2012 at 10:41pm

आचार्यवर, आपकी मुक्तिका के बंद बेहतर लगे हैं. विशेषकर, यह बंद -

गैर कोई नहीं, है अपरिचित अगर
बाँह फैला गले से लगाते रहो.. 

किन्तु, बाग से बागियों से न दूरी रहे   की पंक्ति में न जाने क्यों मैं उलझ गया हूँ.

सादर

Comment by UMASHANKER MISHRA on June 5, 2012 at 9:59pm

सुन्दर भाव

उद्देश्य पूर्ण बधाई सलिल जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 5, 2012 at 6:14pm

भूल करते सभी, भूलकर भूल को
ख्वाब नयनों में अपने सजाते रहो..
* वाह कितनी बड़ी बात कही सलिल जी ...बहुत प्यारी मुक्तिका बहुत सुन्दर 

Comment by Rekha Joshi on June 5, 2012 at 5:50pm

आदरणीय संजीव जी,सादर नमस्ते ,

मुस्कुराते रहो, खिलखिलाते रहो
स्वर्ग नित इस धरा पर बसाते रहो..
*,बहुत बढ़िया ,बधाई |
Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 5, 2012 at 5:05pm

आदरणीय सलिल जी, सादर अभिवादन 

सुखी जीवन का सुन्दर मूल मन्त्र कितनी खूब सूरती से दिया है. बधाई 

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on June 5, 2012 at 3:03pm

संजीव जी बहुत सुंदर सुंदर पंक्तियाँ पिरोयी हैं आपने इस रचना में । बहुत खूब !! बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें !

Comment by Albela Khatri on June 5, 2012 at 9:22am

श्रद्धेय  संजीव वर्मा 'सलिल' जी
आपने सार की बात कह दी ........धन्य हो . बहुत ही शानदार  रचना
इन पंक्तियों ने तो  मन में  घर बाना लिया -

गैर कोई नहीं, है अपरिचित अगर
बाँह फैला गले से लगाते रहो.


बधाई !

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