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दोहा मुक्तिका: पल पल हो मधुमास... --संजीव 'सलिल'

दोहा मुक्तिका:
पल पल हो मधुमास...
संजीव 'सलिल'
*
आसमान में मेघ ने, फैला रखी कपास.
कहीं-कहीं श्यामल छटा, झलके कहीं उजास..
*
श्याम छटा घन श्याम में, घनश्यामी आभास.
वह नटखट छलिया छिपे, तुरत मिले आ पास..
*
सुमन-सुमन में 'सलिल' को, उसकी मिली सुवास.
जिसे न पाया कभी भी, किंचित कभी उदास..
*
उसकी मृदु मुस्कान से, प्रेरित सफल प्रयास.
कर्म-धर्म का मर्म दे, अधर-अधर को हास.
*
पूछ रहा मन मौन वह, क्यों करता परिहास.
क्यों दे पीड़ा उन्हीं को, जिन्हें मानता खास..
*
मोहन भोग कभी मिले, कभी किये उपवास.
दोनों में जो सम रहे, वह खासों में खास..
*
सज्जन पायें शांति-सुख, दुर्जन पायें त्रास.
मूरत उसकी एक पर, भिन्न-भिन्न अहसास..
*
गौओं के संग विचरता, पद-तल कोमल घास.
सिहर सराहे भाग्य निज,  पल-लप हो मधुमास..
*
कभी अधर पर मुरलिया, कभी सरस मृदु हास.
'सलिल' अधर पर धर नहीं, कभी सत्य-उपहास..
*** 

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on June 7, 2012 at 10:57am

bahut saargarvit rachna sir ji saadhuwaad sahit nama aapko ..............

Comment by AVINASH S BAGDE on June 7, 2012 at 10:42am

श्याम छटा घन श्याम में, घनश्यामी आभास.

वह नटखट छलिया छिपे, तुरत मिले आ पास..

उसकी मृदु मुस्कान से, प्रेरित सफल प्रयास.
कर्म-धर्म का मर्म दे, अधर-अधर को हास.....bahut umda Saleel ji.


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Comment by rajesh kumari on June 6, 2012 at 4:28pm

बहुत सुन्दर भक्ति भाव से परिपूर्ण दोहावली बहुत बधाई 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on June 6, 2012 at 1:34pm

बहुत सुन्दर रचना सर जी, केवल आनंद लिया जा सकता है शब्द नहीं बखान हेतु. बधाई.

Comment by डॉ. सूर्या बाली "सूरज" on June 6, 2012 at 12:43pm

सलिल जी सादर नमस्कार !सुंदर साहित्यिक दोहे जो आम जीवन की सच्चाई बयान कर रहे हैं। इस सुंदर प्रशतुति ने मन मोह लिया। बार बार पढ़ने की इच्छा हो रही है। आपको बहुत बहुत बधाई इस सुंदर रचना के लिए !!

Comment by Albela Khatri on June 6, 2012 at 10:26am

धन्य हो  सलिल जी,
वाह वाह  क्या अनुपम दोहे कहे हैं...मन में आनन्द की  सुवास प्रसर गई.

विशेषकर इन दोहों  में मुझे  आत्मिक  सन्तोष हुआ :
पूछ रहा मन मौन वह, क्यों करता परिहास.
क्यों दे पीड़ा उन्हीं को, जिन्हें मानता खास..
*
मोहन भोग कभी मिले, कभी किये उपवास.
दोनों में जो सम रहे, वह खासों में खास..
*
सज्जन पायें शांति-सुख, दुर्जन पायें त्रास.
मूरत उसकी एक पर, भिन्न-भिन्न अहसास

जय हो

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