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नीम में लगती दीमक
रिश्तों में मिठास नहीं
डूब गयी आशा किरण
एक दूजे पे विश्वास नहीं
रिश्तों का प्रबल क्षरण
जुड़ने के आसार नहीं
घर घर छिड़ा अब रण
मीठा स्वप्न संसार नहीं
चन्दन लिपटत न भुजंग
शीतलता का वास नहीं
माता करती भ्रूण भंग
नारी के संस्कार नहीं
भूल गए करना सत्संग
जीवन से अब प्यार नहीं

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Comment

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on June 21, 2012 at 10:02am

kya baat hai bahut sundar sir ji ................aaj ke sach se sakshatkaar karaati aapki rachna waah waah

Comment by Albela Khatri on June 21, 2012 at 8:38am

बहुत अच्छा प्रदीप जी,
वाह !


माता करती भ्रूण भंग
नारी के संस्कार नहीं
भूल गए करना सत्संग
जीवन से अब प्यार नहीं

___उत्तम रचना के लिए  हार्दिक बधाई !


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on June 20, 2012 at 10:12pm

बहुत सुन्दर आज के समाज की सच्चाई भरे शब्द सार्थक भाव 

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on June 20, 2012 at 10:09pm

आदरणीय सर, आज की जीवनशैली जिसे आधुनिक कहा जाता है उस पर बिलकुल सही कटाक्ष किया आपने...

कृपया ध्यान दे...

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