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मैं वो हिंद औ वो वतन ढूंढता हूँ

मैं बंजर जमीं पे चमन ढूंढता हूँ 
यूँ दिल को जलाते जलन ढूंढता हूँ

हैं हर-सू धमाके डराते दिलों को
है आतंक फिर भी अमन ढूंढता हूँ

था इतिहास में जो परिंदा सुनहरा  
मैं वो हिंद औ वो वतन ढूंढता हूँ

जो लिपटे तिरंगा बदन से सुकूँ लूं
वो दो गज जमीं वो कफ़न ढूंढता हूँ

जो पैसा कमाना अभी सीखते हैं
मैं उनमे कलामो रमन ढूंढता हूँ

है अब की सियासत बुरी "दीप" लेकिन 
वो उम्दा पुराना चलन ढूंढता हूँ

संदीप पटेल "दीप"

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Comment by UMASHANKER MISHRA on July 13, 2012 at 11:08pm

था इतिहास में जो परिंदा सुनहरा  
मैं वो हिंद औ वो वतन ढूंढता हूँ

जो लिपटे तिरंगा बदन से सुकूँ लूं
वो दो गज जमीं वो कफ़न ढूंढता हूँ

बहुत ही सुन्दर खास के ये दो लाईन  झकझोर कर रख दी संदीप जी बहुत सुन्दर है आपकी ये रचना

Comment by आशीष यादव on July 13, 2012 at 12:27am

वाह संदीप सर,
बहुत उम्दा।
था इतिहास में जो परिंदा सुनहरा
मैं वो हिंद औ वो वतन ढूंढता हूँ ।
बेहतरीन शे'र और बेहतरीन गजल।

Comment by Rekha Joshi on July 13, 2012 at 12:02am

संदीप जी 

था इतिहास में जो परिंदा सुनहरा   
मैं वो हिंद औ वो वतन ढूंढता हूँ ,सुंदर अभिव्यक्ति ,बधाई 
Comment by deepti sharma on July 12, 2012 at 10:46pm

जो लिपटे तिरंगा बदन से सुकूँ लूं
वो दो गज जमीं वो कफ़न ढूंढता हूँ

वाह बहुत खूब  बहुत ही सुंदर रचना बधाई आपको

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on July 12, 2012 at 10:20pm

था इतिहास में जो परिंदा सुनहरा   
मैं वो हिंद औ वो वतन ढूंढता हूँ 

जो लिपटे तिरंगा बदन से सुकूँ लूं 
वो दो गज जमीं वो कफ़न ढूंढता हूँ 

प्रिय संदीप  जी ..देश भक्ति से ओत प्रोत रचना ..जय हिंद ..जागो नवजवानों जागो आओ स्वप्न देखें उस सोने की चिड़िया के  ...बधाई 

भ्रमर ५  ..

 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on July 12, 2012 at 7:52pm

आदरणीया डॉ साहिबा आपको ग़ज़ल पसनद आई मेरा लिखना सफल हो गया
आपका बहुत बहुत शुक्रिया और सादर आभार


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 12, 2012 at 6:21pm

आ. संदीप पटेल जी

बेहद खूबसूरत ग़ज़ल...
 
था इतिहास में जो परिंदा सुनहरा  
मैं वो हिंद औ वो वतन ढूंढता हूँ ...... स्विस बैंक में बंद है शायद
 
जो पैसा कमाना अभी सीखते हैं
मैं उनमे कलामो रमन ढूंढता हूँ...... बहुत सुन्दर
 
हर शेर देशप्रेम  की खुशबू से महक रहा है... बेहद सुन्दर ख़ोज....
वो उम्दा पुराना चलन ढूंढता हूँ
हार्दिक बधाई स्वीकार करें.

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